तेजस्वी का तेज गया, नीतीश का क्रेज गया

0
Screenshot_2025-07-05-13-13-37-40_3a637037d35f95c5dbcdcc75e697ce91


बिहार की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी युवा जोश और आक्रामकता के पर्याय रहे तेजस्वी यादव का “तेज” अब मंद पड़ता दिख रहा है, वहीं नीतीश कुमार, जो “सुशासन बाबू” के नाम से जाने जाते थे, उनका “क्रेज” भी जनता के बीच पहले जैसा नहीं रहा।

कहाँ गया वह तेजस्वी का “तेज”?



2020 के विधानसभा चुनावों में तेजस्वी यादव ने जिस तरह से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का नेतृत्व किया था, वह काबिले तारीफ था। उन्होंने बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर युवाओं को अपने साथ जोड़ा और महागठबंधन को एक मजबूत चुनौती के रूप में पेश किया। तब उनकी रैलियों में भीड़ उमड़ती थी और उनके भाषणों में एक खास “तेज” नजर आता था। लेकिन, हाल के घटनाक्रमों को देखें तो वह धार अब गायब दिख रही है। सरकार में रहते हुए, उनकी राजनीतिक सक्रियता में कमी आई है। कई अहम मुद्दों पर उनका मौन या नरम रुख उनके समर्थकों को भी निराश कर रहा है। ऐसा लगता है मानो सत्ता के सुख ने उनके उस जुझारू तेवर को कम कर दिया है, जो उन्हें विपक्ष में रहते हुए जनता के लिए लड़ने को प्रेरित करता था।

नीतीश “क्रेज” की घट रही चमक



नीतीश कुमार ने बिहार में एक दशक से अधिक समय तक मुख्यमंत्री के रूप में काम किया और अपनी साफ-सुथरी छवि और विकासोन्मुखी राजनीति के लिए जाने जाते थे। “सुशासन बाबू” का टैग उनकी पहचान बन गया था। लेकिन, पिछले कुछ समय से उनके बार-बार पाला बदलने और गठबंधन में स्थिरता न रखने की वजह से उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। जनता के मन में यह धारणा बन गई है कि वे केवल कुर्सी बचाने के लिए राजनीतिक जोड़-तोड़ करते हैं, न कि प्रदेश के व्यापक हित में। राज्य में बढ़ती बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था के कुछ मुद्दे और सरकार की धीमी प्रतिक्रिया ने भी उनकी लोकप्रियता को प्रभावित किया है। नतीजन, कभी नीतीश के हर फैसले पर वाहवाही करने वाले लोग अब उनमें पहले जैसा “क्रेज” नहीं देखते।

तेजस्वी और नीतीश की चुनौतियां



बिहार की राजनीति में यह बदलाव आगामी चुनावों के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। दोनों ही नेताओं को अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए अब कड़ी मशक्कत करनी होगी। तेजस्वी को अपनी खोई हुई आक्रामकता और जनता के मुद्दों पर पहले जैसा मुखर रुख अपनाना होगा, वहीं नीतीश कुमार को अपनी विश्वसनीयता वापस हासिल करने और जनता के बीच अपनी “सुशासन बाबू” वाली छवि को फिर से स्थापित करने की चुनौती का सामना करना होगा।
यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की राजनीति के ये दोनों प्रमुख चेहरे आने वाले समय में किस तरह अपनी पहचान और प्रभाव को बचा पाते हैं।

Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed