वक्फ पर चुनावी संग्राम: बिहार में गरमाई सियासत, क्या चुनाव आ गए?

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पटना, बिहार: संसद से पारित नया वक्फ कानून बिहार की राजनीतिक गलियों में तीखे झन्नाटे पैदा कर रहा है, और यह सवाल हर जुबान पर है कि क्या राज्य में विधानसभा चुनावों की बिसात बिछाई जाने लगी है. इस कानून ने अचानक ही मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों को एक मंच पर ला खड़ा किया है, जिन्होंने इसके खिलाफ एकजुट होकर जबरदस्त विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है. चुनावी मौसम की आहट के साथ, यह कानून अब सियासी दलों के लिए मुस्लिम मतदाताओं को साधने का एक नया हथियार बन गया है.

एकजुट विरोध की हुंकार:



नए वक्फ कानून को लेकर मुस्लिम संगठनों में भारी रोष व्याप्त है. उनका आरोप है कि यह कानून वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और धार्मिक स्वतंत्रता में अनावश्यक सरकारी हस्तक्षेप को बढ़ावा देता है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे प्रमुख संगठनों के साथ-साथ कई स्थानीय अंजुमनों ने भी इस कानून को “असंवैधानिक” और “शरई मामलों में दखल” करार देते हुए इसके खिलाफ आवाज बुलंद की है. इन संगठनों ने बिहार के कोने-कोने में विरोध प्रदर्शन, सभाएं और रैलियां आयोजित कर सरकार पर कानून को वापस लेने का दबाव बनाना शुरू कर दिया है.

विपक्षी दलों का चुनावी दांव:



मुस्लिम संगठनों के इस मुखर विरोध को विपक्षी दलों ने तुरंत अपने चुनावी एजेंडे में शामिल कर लिया है. राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस और वामपंथी दल समेत कई क्षेत्रीय पार्टियों ने खुले तौर पर इस कानून को “काला कानून” बताते हुए इसे सत्ता में आते ही रद्द करने का वादा किया है. RJD नेता तेजस्वी यादव ने एक जनसभा में कहा, “यह भाजपा सरकार की मुस्लिम विरोधी मानसिकता को दर्शाता है. हम बिहार में सरकार बनाते ही इस दमनकारी कानून को कूड़ेदान में फेंक देंगे.” वहीं, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने इसे “संविधान और अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमला” करार दिया है.


यह स्पष्ट है कि विपक्षी दल इस मुद्दे को मुस्लिम मतदाताओं को अपने पाले में लाने के एक बड़े अवसर के रूप में देख रहे हैं. बिहार की आबादी में मुसलमानों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और उनका वोट बैंक किसी भी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाता है. वक्फ कानून पर कड़ा रुख अपनाकर विपक्षी दल न केवल मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी पैठ मजबूत करना चाहते हैं, बल्कि यह संदेश भी देना चाहते हैं कि वे अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं.

सत्ता पक्ष की चुप्पी और बचाव:


दूसरी ओर, सत्ताधारी भाजपा और उसके सहयोगी दल इस मुद्दे पर फिलहाल बचाव की मुद्रा में नजर आ रहे हैं. हालांकि केंद्र सरकार ने इस कानून को वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन और पारदर्शिता के लिए आवश्यक बताया है, लेकिन बिहार में भाजपा नेता इस पर सीधे तौर पर कोई तीखी प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं. उन्हें डर है कि इस मुद्दे पर मुखरता उन्हें बहुसंख्यक वोटों को एकजुट करने में मदद कर सकती है, लेकिन साथ ही अल्पसंख्यक वोटों को पूरी तरह से दूर कर सकती है, जो बिहार जैसे राज्य में चुनावी गणित को जटिल बना देगा. कुछ नेताओं ने हालांकि यह तर्क दिया है कि कानून वक्फ बोर्डों को अधिक अधिकार देता है और भ्रष्टाचार को रोकेगा, लेकिन यह तर्क मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों के आरोपों के सामने फीका पड़ रहा है.

चुनावी आहट और वक्फ का ‘वोट बैंक’:


यह समझना मुश्किल नहीं है कि वक्फ कानून पर यह अचानक उथल-पुथल बिहार की चुनावी जमीन को उपजाऊ बनाने की कवायद है. अगले विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दल अभी से अपनी गोटियां बिछाना शुरू कर चुके हैं. वक्फ का मुद्दा अब केवल धार्मिक या प्रशासनिक नहीं रह गया है; यह सीधे तौर पर मुस्लिम वोट बैंक से जुड़ गया है. विपक्षी दल इस मुद्दे को उठाकर भाजपा पर अल्पसंख्यक विरोधी होने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि भाजपा को इस मामले में सावधानी बरतनी पड़ रही है ताकि वह अपने मुख्य वोट आधार को नाराज न करे और साथ ही मुस्लिम समुदाय में भी अनावश्यक वैमनस्य न पैदा हो.


कुल मिलाकर, वक्फ कानून ने बिहार में एक नई राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है. यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी दिनों में यह मुद्दा किस करवट बैठता है और क्या यह वास्तव में बिहार के चुनावी समीकरणों में कोई बड़ा उलटफेर कर पाता है. फिलहाल, इतना तो तय है कि इस कानून ने बिहार की सियासत में गर्मी बढ़ा दी है और आने वाले समय में इस पर और भी ‘झन्नाटेदार’ बयानबाजी देखने को मिल सकती है.

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