विकास या विनाश? औरंगाबाद में ‘बियाडा’ के खिलाफ बगावत, किसानों का दो टूक जवाब- “जान दे देंगे, पर जमीन नही

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औरंगाबाद के कुटुंबा प्रखंड में “विकास” और “अस्तित्व” के बीच एक बड़ी जंग छिड़ गई है। बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (बियाडा) के तहत फैक्ट्री लगाने के लिए प्रशासन जिसे ‘सुनहरा अवसर’ बता रहा है, उसे स्थानीय किसानों ने अपनी ‘मौत का फरमान’ मान लिया है। डुमरी स्थित पंचायत सरकार भवन में बुलाई गई आम सभा, प्रशासन और पब्लिक के बीच तीखी नोकझोंक का गवाह बनी, जहां ग्रामीणों ने एक स्वर में अपनी जमीन देने से साफ इनकार कर दिया है।

अधिकारी के वादे बनाम किसान का दर्द

आम सभा में मौजूद एसडीओ (SDO) ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि बियाडा परिसर में फैक्ट्रियां लगने से इलाके की तस्वीर बदल जाएगी और रोजगार की बहार आएगी। प्रशासन ने महसु, इरियप, जौड़ा और करमडीह गांव की जमीन को इसके लिए चयनित किया है।

लेकिन, ग्रामीणों ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। उनका कहना है कि यह जमीन ही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है।

“साहब! अब जमीन बची ही कहां है?”

किसानों का गुस्सा बेवजह नहीं है। उनका दर्द है कि विकास के नाम पर उन्हें बार-बार उजाड़ा जा रहा है। ग्रामीणों ने बताया कि पहले नहर और फिर ‘भारत माला परियोजना’ (वाराणसी-कोलकाता ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे) के लिए उनकी काफी जमीन पहले ही ली जा चुकी है। अब उनके पास खेती के लिए नाममात्र की जमीन बची है, जिससे वे अपने परिवार का पेट पालते हैं। अगर यह भी चली गई, तो कई किसान पूरी तरह भूमिहीन हो जाएंगे और उनके सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी।

कानून की धज्जियां उड़ाने का आरोप

यह मामला सिर्फ भावनाओं का नहीं, बल्कि कानून का भी है। ग्रामीणों ने जिलाधिकारी (DM) को दिए आवेदन में प्रशासन पर भूमि अर्जन अधिनियम 2013 के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया है।

  • प्रक्रिया नदारद: ग्रामीणों का आरोप है कि सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment), जन सुनवाई और विशेषज्ञ समिति के गठन जैसी अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
  • दस्तावेज गायब: सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन की कॉपी बार-बार मांगने पर भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है।
  • गरीबों पर वार: जिस 235 एकड़ 46 डिसमिल जमीन (कुल प्रस्ताव 400 एकड़ का) के अधिग्रहण की बात हो रही है, वह ज्यादातर अनुसूचित जाति और अति पिछड़ा वर्ग के सीमांत किसानों की है।

“वैकल्पिक रास्ता मौजूद, फिर जिद क्यों?”

किसानों ने प्रशासन को एक सुझाव भी दिया है, जो उनकी सूझबूझ को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि एक्सप्रेस-वे से महज 500 मीटर की दूरी पर कम उपजाऊ (बंजर) और कम प्रभाव वाली वैकल्पिक जमीन उपलब्ध है, जो पक्की सड़क से भी जुड़ी है। लेकिन आरोप है कि प्रशासन उस विकल्प पर विचार करने के बजाय उपजाऊ जमीन हथियाने पर तुला है, जो कि सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन है।

आगे क्या?

फिलहाल माहौल तनावपूर्ण है। प्रशासन की अगली कार्रवाई और डीएम के फैसले पर सभी की नजरें टिकी हैं। लेकिन पंचायत भवन के बाहर जमा भीड़ और चेहरों पर दिख रही चिंता (जैसा कि तस्वीर में देखा जा सकता है) यह बताने के लिए काफी है कि किसान अपनी माटी बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

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