BIG BREAKING: बिहार में ‘टारगेट’ का नशा! शराबबंदी की आड़ में वर्दी का ‘वसूली रैकेट’ बेनकाब
सांसों में शराब नहीं, मशीन में थी ‘सेटिंग’: औरंगाबाद में ‘कोटा’ पूरा करने के लिए मजदूरों को बनाया गया बलि का बकरा?
स्पेशल क्राइम रिपोर्ट
बिहार में शराबबंदी कानून का खौफ शराब माफियाओं को हो न हो, लेकिन मेहनत-मजदूरी कर पेट पालने वालों को जरूर है। औरंगाबाद से जो खबर सामने आई है, वह ‘सुशासन’ के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है। यहाँ शराब पकड़ने वाली टीम पर ‘सरकारी अपहरण’ और ‘फर्जीवाड़े’ का सनसनीखेज आरोप लगा है।
आरोप है कि उत्पाद विभाग (Excise Department) की टीम ने ‘टारगेट’ पूरा करने के लिए थके-हारे मजदूरों को उठाया, ब्रेथ एनालाइजर मशीन में ‘खेल’ किया और उन्हें शराबी घोषित कर जेल भेजने का डर दिखाकर मोटी वसूली की।
सवालों के घेरे में ‘बिना नंबर वाली’ सरकारी गाड़ियां
कहानी पूरी फिल्मी है। अंबा-देव रोड, चार नंबर फॉल के पास सन्नाटा था। वहां दो गाड़ियां खड़ी थीं, जिन पर नंबर प्लेट तक नहीं थी। गुरुवार की शाम बोरिंग का काम निपटाकर तीन मजदूर— भीम पासवान, अवधेश पासवान और मनदीप पासवान—पैदल अपने घर लौट रहे थे।
तभी इन गाड़ियों से उत्पाद विभाग के जवान (जो कथित तौर पर बिना नंबर की गाड़ी से शिकार खोज रहे थे) उतरे और तीनों को दबोच लिया। मजदूरों का कसूर सिर्फ इतना था कि वे उस रास्ते से गुजर रहे थे। जब उन्होंने शराब पीने से इनकार किया, तो उन्हें जबरन गाड़ी में ठूंस लिया गया और शहर की सड़कों पर घुमाया जाने लगा।
“साहब! मशीन में 0 आया है”… “अरे, टारगेट कम है, दोबारा चेक करो”
इस कांड का सबसे खौफनाक पहलू जमहोर स्थित बैरक में सामने आया। पीड़ित मजदूरों का दावा है कि जब पहली बार ब्रेथ एनालाइजर मशीन से जांच हुई, तो अल्कोहल की मात्रा शून्य (0) थी। वहां मौजूद सिपाही ने कहा, “इन्होंने नहीं पी है, छोड़ देते हैं।”
लेकिन, आरोप है कि वहां मौजूद एक अधिकारी को कानून से ज्यादा अपने ‘टारगेट’ की चिंता थी। उसने कथित तौर पर कहा— “दो लोगों का टारगेट कम पड़ रहा है।” इसके बाद जो हुआ, वह जांच का विषय है। आरोप है कि मशीन में कुछ छेड़छाड़ की गई या कुछ मिलाया गया। जब दोबारा फूंक मरवाई गई, तो रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। यानी नशा मजदूरों ने नहीं, बल्कि सिस्टम ने कर रखा था।
वसूली का ‘रेट कार्ड’: रिहाई से लेकर मोबाइल तक का सौदा
फर्जी रिपोर्ट के आधार पर शुरू हुआ असली ‘खेल’—वसूली का।
- भाई को छोड़ा, ताकि पैसे ला सके: पुलिस ने भीम पासवान के भाई अवधेश को इस शर्त पर छोड़ा कि वह घर जाकर पैसे लाए। डिमांड 10,000 रुपये की थी, जो बाद में 5,000 रुपये पर तय हुई।
- मोबाइल वापसी का टैक्स: जब मजदूर कोर्ट से जुर्माना भरकर छूटे और अपना जब्त मोबाइल लेने पहुंचे, तो वहां भी उन्हें बख्शा नहीं गया। मोबाइल लौटाने के एवज में एक कर्मी ने 1,000 रुपये की घूस मांगी। पैसे देने के बाद ही फोन मिला।
सत्ता पक्ष भी शर्मिंदा, अधिकारी बोले- ‘जांच करेंगे’
मामला इतना तूल पकड़ चुका है कि सरकार की सहयोगी पार्टी JDU के नेता हीरा सिंह ने भी इसे गंभीर बताया है। उन्होंने माना कि कुछ भ्रष्ट अधिकारी सरकार की छवि पर कालिख पोत रहे हैं।
वहीं, जब उत्पाद अधीक्षक मनोज कुमार राय से इस ‘वसूली रैकेट’ पर सवाल किया गया, तो उन्होंने वही रटा-रटाया सरकारी जवाब दिया— “मामले की जानकारी नहीं है। ड्यूटी चार्ट देखा जाएगा। जांच होगी, दोषी बख्शे नहीं जाएंगे।”
तीखे सवाल:
- बिना नंबर प्लेट की गाड़ियां: क्या उत्पाद विभाग को बिना नंबर की गाड़ियों से ‘छापेमारी’ (या शिकार?) करने की छूट मिली है?
- मशीन की विश्वसनीयता: अगर पहली बार में रिपोर्ट नेगेटिव थी, तो दूसरी बार पॉजिटिव कैसे हुई? क्या मशीनों में ‘मैन्युपुलेशन’ हो रहा है?
- टारगेट सिस्टम: क्या शराबबंदी का मकसद नशा मुक्ति है या फिर हर दिन मुजरिमों की एक तय संख्या पूरी करना?
औरंगाबाद की यह घटना बताती है कि कैसे एक सख्त कानून का इस्तेमाल ‘उगाही’ के हथियार के रूप में किया जा रहा है। अगर गरीबों की गाढ़ी कमाई इसी तरह सिस्टम की भेंट चढ़ती रही, तो शराबबंदी की सफलता पर सवाल उठना लाजिमी है। अब देखना यह है कि एसपी साहब इस ‘हाई प्रोफाइल’ मामले में क्या एक्शन लेते हैं।
