बिहार में सत्ता का आत्मघाती प्रदर्शन, बिहार बंद से NDA को फायदे से ज़्यादा नुकसान
बिहार की राजनीति ने शुक्रवार को एक ऐसा अभूतपूर्व दृश्य देखा, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए किसी विडंबना से कम नहीं। जो सत्ताधारी दल कल तक बंद और चक्का जाम को विकास विरोधी और राष्ट्र-विरोधी बताते नहीं थकते थे, आज वही दल बिहार को बंद कराने के लिए सड़कों पर थे। प्रधानमंत्री की माँ के अपमान के विरोध में NDA, खासकर भाजपा द्वारा आयोजित यह बंद, सतही तौर पर भले ही सम्मान और अस्मिता की लड़ाई दिखे, लेकिन राजनीतिक विश्लेषण की कसौटी पर यह एक ऐसा आत्मघाती कदम है, जिसका फायदा कम और नुकसान कहीं ज़्यादा है।

सबसे पहला और बड़ा सवाल तो भूमिकाओं के विरोधाभास का है। बंद, धरना और प्रदर्शन विपक्ष का हथियार होता है, क्योंकि उसके पास व्यवस्था को सीधे तौर पर नियंत्रित करने की शक्ति नहीं होती। लेकिन जब सत्ताधारी दल ही विपक्ष की भूमिका में उतर आए और अपनी ही सरकार के कामकाज को ठप करे, तो यह उसकी राजनीतिक हताशा और वैचारिक दिवालियापन को दर्शाता है। यह जनता के बीच एक सीधा संदेश भेजता है कि सरकार शासन चलाने से ज़्यादा सड़क की राजनीति में दिलचस्पी रखती है। इससे व्यवस्था पर सरकार के इक़बाल का दावा कमजोर होता है।

दूसरा पहलू आर्थिक है। भाजपा और एनडीए हमेशा से खुद को विकास, व्यापार और सुशासन का पैरोकार बताते रहे हैं। ऐसे में, अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए पूरे राज्य पर एक दिन का आर्थिक बोझ डालना उनकी अपनी ही विचारधारा के खिलाफ जाता है। एक बंद से दिहाड़ी मजदूर की रोजी-रोटी छिनती है, छोटे व्यापारी का नुकसान होता है और राज्य की अर्थव्यवस्था को करोड़ों का झटका लगता है। क्या प्रधानमंत्री की माँ का सम्मान उस गरीब मजदूर के भूखे पेट से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया, जिसे सत्ताधारी दल ने ही आज काम करने से रोक दिया? विपक्ष जब बंद करता है तो NDA उसे “जनता को परेशान करने वाला” बताता है, लेकिन जब वह खुद करे तो यह “सम्मान की लड़ाई” कैसे हो जाता है? यह दोहरा मापदंड जनता बखूबी समझती है।

तीसरा और सबसे गंभीर नुकसान छवि का है। बंद कभी भी पूरी तरह से स्वैच्छिक नहीं होता। इसमें जोर-जबरदस्ती और दबंगई की तस्वीरें आम होती हैं। जब सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर किसी शिक्षक को रोकते हैं, किसी आम नागरिक से बदसलूकी करते हैं, तो यह “सत्ता संरक्षित गुंडागर्दी” का रूप ले लेता है। यह भाजपा की उस “पार्टी विथ अ डिफरेंस” और “कानून के राज” वाली छवि को तार-तार कर देता है। यह विपक्ष को बैठे-बिठाए यह कहने का मौका देता है कि सत्ता का नशा एनडीए नेताओं के सिर चढ़कर बोल रहा है।

राजनीतिक तौर पर भी यह एक गलत रणनीति थी। अगर किसी ने प्रधानमंत्री की माँ को अपशब्द कहे, तो यह निंदनीय है और कानून अपना काम कर रहा था, गिरफ्तारी भी हो चुकी थी। एनडीए इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस, निंदा प्रस्ताव और कानूनी कार्रवाई के जरिए विपक्ष को घेर सकती थी। लेकिन पूरे राज्य को बंधक बनाकर उसने सहानुभूति हासिल करने के बजाय जनता का गुस्सा मोल ले लिया है। यह कदम एक राजनीतिक बूूमरैंग साबित हो सकता है, जहाँ हथियार चलाने वाले पर ही उल्टा वार कर दे।

निष्कर्षतः, यह बिहार बंद शक्ति प्रदर्शन कम, बल्कि एक राजनीतिक अपरिपक्वता का प्रदर्शन ज़्यादा था। इसने एनडीए की छवि को एक जिम्मेदार शासक दल से हटाकर एक अधीर और सड़क पर उतरने वाले आंदोलनकारी दल की बना दिया है। बिहार विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े एनडीए के लिए यह बंद फायदे का सौदा नहीं, बल्कि अपनी ही राजनीतिक जमीन पर खोदा गया एक गड्ढा साबित हो सकता है, जिसमें फिसलने का खतरा सबसे ज़्यादा उसी का है।