बिहार विधानसभा चुनाव 2025- रफीगंज विधानसभा सीट से प्रमोद कुमार सिंह को टिकट नहीं, तो NDA की जीत नहीं?

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औरंगाबाद, बिहार। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की रणभेरी बजने में अभी वक्त है, लेकिन औरंगाबाद जिले की सबसे चर्चित सीटों में से एक रफीगंज का सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है। यहां लड़ाई सीधे तौर पर महागठबंधन बनाम NDA की है, लेकिन इस लड़ाई के केंद्र में एक ऐसा नाम है जो दोनों गठबंधनों का खेल बनाने और बिगाड़ने की पूरी क्षमता रखता है – लोजपा (रामविलास) के कद्दावर नेता प्रमोद कुमार सिंह। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि अगर NDA ने प्रमोद कुमार सिंह को टिकट देने में जरा भी चूक की, तो 2020 का इतिहास खुद को दोहराएगा और एनडीए की हार निश्चित हो जाएगी।

2020 का सबक, जो NDA को याद रखना होगा

​इस विश्लेषण को समझने के लिए पांच साल पीछे लौटना जरूरी है। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में रफीगंज सीट पर त्रिकोणीय संघर्ष हुआ था। उस समय लोजपा NDA का हिस्सा नहीं थी और प्रमोद कुमार सिंह भी लोजपा में नहीं थे । प्रमोद कुमार सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने अकेले दम पर लगभग 50,000 से अधिक वोट हासिल कर दूसरा स्थान प्राप्त किया। उनके इस प्रदर्शन ने NDA के आधिकारिक प्रत्याशी (जदयू के अशोक कुमार सिंह) के सारे समीकरण बिगाड़ दिए, जो मात्र 27,000 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर खिसक गए। प्रमोद सिंह द्वारा की गई वोटों की इस बड़ी सेंधमारी का सीधा फायदा RJD के मोहम्मद नेहालुद्दीन को मिला और वह लगभग 63,000 वोट पाकर आसानी से चुनाव जीत गए।

​यह नतीजा साफ तौर पर दिखाता है कि प्रमोद कुमार सिंह रफीगंज में एक व्यक्ति के तौर पर एक बड़ी राजनीतिक शक्ति हैं, जिनका अपना एक ठोस और बड़ा जनाधार है। 2020 में उन्होंने यह साबित कर दिया कि वह भले ही चुनाव न जीतें, लेकिन यह तय करने की पूरी क्षमता रखते हैं कि कौन चुनाव हारेगा।

2025 का नया समीकरण: प्रमोद की दावेदारी क्यों है मज़बूत?

​अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) एनडीए का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और सीट बंटवारे में अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रही है। प्रमोद कुमार सिंह क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं और लोजपा की तरफ से टिकट के सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। उनका खेमा पूरी तरह आश्वस्त है कि 2020 के प्रदर्शन को देखते हुए NDA उन्हें नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठाएगा।

​सूत्रों की मानें तो यह लगभग तय है कि अगर किसी भी कारणवश (जैसे जदयू द्वारा सीट पर दावा) प्रमोद कुमार सिंह को एनडीए से टिकट नहीं मिलता है, तो वह एक बार फिर निर्दलीय मैदान में उतरेंगे। ऐसी स्थिति में एनडीए के लिए 2020 वाला दुःस्वप्न लौटना तय है। प्रमोद सिंह भले ही खुद न जीतें, लेकिन वह एनडीए के वोटों में इतनी बड़ी सेंधमारी निश्चित रूप से करेंगे कि महागठबंधन के प्रत्याशी की जीत की राह आसान हो जाएगी।

जनसुराज की एंट्री से और भी पेचीदा हुई लड़ाई

​इस बार के समीकरण में प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी एक नया कोण जोड़ रही है। जनसुराज ने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। रफीगंज में भी उनका प्रत्याशी मैदान में होगा। हालांकि, यह देखना बाकी है कि जनसुराज का उम्मीदवार किसके वोटों में ज़्यादा कटौती करेगा, लेकिन यह तय है कि उनकी उपस्थिति से मुकाबला और भी बहुकोणीय और अप्रत्याशित हो जाएगा।

​कुल मिलाकर, रफीगंज विधानसभा सीट का भविष्य इस बात पर टिका है कि एनडीए का शीर्ष नेतृत्व 2020 के नतीजों से क्या सबक लेता है। अगर प्रमोद कुमार सिंह एनडीए के उम्मीदवार होते हैं, तो मुकाबला सीधा और कांटे का होगा। लेकिन अगर टिकट बंटवारे में उन्हें नजरअंदाज किया गया, तो एनडीए एक बार फिर अपनी जीती हुई बाजी को विपक्ष की झोली में डालने का काम करेगा, और इसका सीधा फायदा महागठबंधन को मिलेगा।

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