बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था, मौत और लूट का अभिशाप

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​ बिहार की धरती पर आज भी ‘जन आरोग्य’ का नारा एक क्रूर मज़ाक बनकर रह गया है। यहाँ की स्वास्थ्य व्यवस्था एक ऐसी दोमुंही तलवार है, जिसका एक सिरा सरकारी अस्पतालों की लापरवाही और दूसरा प्राइवेट अस्पतालों की बेशर्मी से लबरेज है। दोनों ही सिरों पर गरीब और लाचार जनता का लहू बह रहा है। यह सिर्फ एक सिस्टम की असफलता नहीं, बल्कि एक राज्य की सामूहिक चेतना पर लगा कलंक है।

सरकारी अस्पतालों का सच: जब मौत का वारंट मिलता है

​सरकारी अस्पताल अब ‘बीमारों को ठीक करने’ के बजाय ‘बीमारियों से हारने’ का पर्याय बन गए हैं। ये अस्पताल, जो आम जनता की उम्मीद का आखिरी केंद्र होने चाहिए थे, आज मौत का दूसरा नाम बन चुके हैं। टूटी हुई इमारतें, जंग लगे उपकरण, और नदारद डॉक्टर। यहाँ की गलियों में सिसकती हुई जिंदगियां और टूटे हुए सपने बिखरे पड़े हैं।

​क्या हमने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली है? जब एक गरीब, अपने बीमार बच्चे को लेकर अस्पताल पहुँचता है, तो उसे घंटों इंतजार करने के बाद यह सुनने को मिलता है, “यहाँ इलाज नहीं होगा, पटना जाओ।” इस ‘पटना जाओ’ के पीछे छिपा है वह सच, जो बताता है कि सरकारी अस्पतालों में सिर्फ कागजी काम होता है, इंसानियत का नहीं।

प्राइवेट अस्पतालों का सच: लूट का दूसरा नाम

​जब सरकारी व्यवस्था मौत का वारंट थमा देती है, तो लोग अपनी बची-खुची उम्मीदों के साथ प्राइवेट अस्पतालों का रुख करते हैं। लेकिन यहाँ, इलाज नहीं, बल्कि इंसान की मजबूरी का सौदा होता है। एक साधारण बुखार को भी ‘गंभीर’ बताकर, लाखों का बिल बना दिया जाता है। मरीज के परिजन अपनी ज़मीन-जायदाद बेचकर, गहने गिरवी रखकर इलाज करवाते हैं, और आखिर में, जब उनके पास कुछ नहीं बचता, तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता है कि “अब भगवान के हाथ में है।”

​इन अस्पतालों के लिए इंसान की जिंदगी की कीमत सिर्फ मुनाफ़ा है। ये वो बाज़ार हैं जहाँ इंसानियत की नहीं, बल्कि लालच की बोली लगती है।

तीखा सवा

​बिहार की सरकार, जो ‘सुशासन’ का दावा करती है, क्या उसे यह नहीं दिखता कि उसके अस्पतालों में क्या हो रहा है? क्या यह सच है कि इस राज्य में गरीब का सिर्फ एक ही अंत है – या तो सरकारी अस्पतालों की लापरवाही से मर जाना, या फिर प्राइवेट अस्पतालों की लूट में तबाह हो जाना?

​जब तक इस दोहरे अभिशाप से मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक बिहार की तरक्की की बातें बेमानी हैं। यह सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि एक लाचार जनता की तरफ से एक कठोर सवाल है। क्या इस सवाल का जवाब किसी के पास है? या फिर हम यूँ ही इस अभिशाप में जीते रहेंगे?

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