Aurangabad politics,रफीगंज विधानसभा में एनडीए का पेंच: दो बार के जदयू विधायक और लोकप्रिय लोजपा नेता में टिकट की होड़, दिलचस्प मुकाबले के आसार
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औरंगाबाद, बिहार। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की आधिकारिक घोषणा भले ही अभी दूर हो, लेकिन राज्य की सियासत में चुनावी तपिश अभी से महसूस की जाने लगी है। औरंगाबाद जिले की हॉट सीट मानी जाने वाली रफीगंज विधानसभा में यह गर्मी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है, जहाँ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर ही टिकट को लेकर एक दिलचस्प और कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। एक तरफ जहाँ जनता दल (यूनाइटेड) के दो बार के विधायक रह चुके अशोक कुमार सिंह अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रदेश उपाध्यक्ष और क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखने वाले प्रमोद कुमार सिंह ने भी ताल ठोक दी है।

दोनों ही नेता खुद को एनडीए का भावी उम्मीदवार बताते हुए क्षेत्र में पूरी तरह से सक्रिय हो गए हैं और अपने-अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हैं। इस आंतरिक खींचतान ने रफीगंज के सियासी पारे को चढ़ा दिया है और यह सवाल तैरने लगा है कि एनडीए का शीर्ष नेतृत्व अनुभवी विधायक पर दांव लगाएगा या फिर जनता के बीच लोकप्रिय और संघर्षशील नेता को मौका देगा।

अशोक सिंह का अनुभव बनाम प्रमोद सिंह की जमीनी पकड़
अशोक कुमार सिंह जदयू के पुराने और अनुभवी नेता हैं। वह दो बार रफीगंज का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था और वह तीसरे स्थान पर खिसक गए थे। इसके बावजूद, पार्टी संगठन और अपने कार्यकाल के दौरान किए गए कार्यों के आधार पर वह अपनी दावेदारी को मजबूत मान रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर, प्रमोद कुमार सिंह की पहचान एक जुझारू और लोकप्रिय नेता की है। 2020 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए लगभग 50,000 वोट हासिल किए थे और महज 10,000 वोटों के अंतर से राजद उम्मीदवार से चुनाव हारे थे। इसी चुनाव में उनके दमदार प्रदर्शन ने जदयू प्रत्याशी अशोक सिंह को तीसरे पायदान पर धकेल दिया था, जो क्षेत्र में प्रमोद सिंह के बढ़ते जनाधार का स्पष्ट संकेत था। प्रमोद सिंह की जनता के बीच निरंतर उपस्थिति और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए सक्रियता को उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है।
क्या कहते हैं सियासी समीकरण?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एनडीए के लिए रफीगंज सीट पर फैसला लेना आसान नहीं होगा। अशोक कुमार सिंह की दावेदारी जदयू कोटे से है, जबकि प्रमोद कुमार सिंह अब लोजपा (रामविलास) के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं, जो एनडीए का एक महत्वपूर्ण घटक दल है।

विश्वस्त सूत्रों और प्रमोद कुमार सिंह के खेमे का मानना है कि इस बार लोजपा (रामविलास) से उनका टिकट लगभग तय है। उनका तर्क है कि 2020 में बिना किसी दल के समर्थन के 50,000 वोट हासिल करना उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता को प्रमाणित करता है। अगर इस बार उन्हें एनडीए का सिंबल मिलता है, तो उनकी जीत की राह आसान हो सकती है। कुछ राजनीतिक पंडित तो यहां तक कह रहे हैं कि अगर प्रमोद सिंह को लोजपा के टिकट पर एनडीए का उम्मीदवार बनाया जाता है, तो वे “दोपहर तक चुनाव जीत जाएंगे,” जो उनकी जीत के प्रति भारी आत्मविश्वास को दर्शाता है।

हालांकि, एक पेंच यह भी है कि अगर जदयू अपने पुराने विधायक अशोक कुमार सिंह पर फिर से भरोसा जताती है, तो प्रमोद कुमार सिंह का अगला कदम क्या होगा। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ऐसी स्थिति में प्रमोद सिंह एक बार फिर निर्दलीय मैदान में उतर सकते हैं, जिससे एनडीए के वोटों का बिखराव होना तय है और इसका सीधा फायदा विपक्षी राजद को मिल सकता है।
बहरहाल, दोनों ही संभावित प्रत्याशी पूरी ताकत से जनसंपर्क में जुटे हैं। टिकट का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन एक बात साफ है कि रफीगंज विधानसभा सीट पर एनडीए की आंतरिक दावेदारी ने इसे चुनाव से पहले ही बिहार की सबसे चर्चित सीटों में से एक बना दिया है। अंतिम फैसला चाहे जो भी हो, यहां का मुकाबला बेहद दिलचस्प होगा और सीधी लड़ाई एनडीए और राजद के बीच ही देखने को मिलेगी।