
आद्य शक्ति भगवती स्वयं कहती है ।
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी । तस्या ममैतन्माहात्मयं श्रुत्वा भक्ति समन्वित: |।
सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वितः|मनुष्योमत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:||
अर्थात शरद ऋतु में मेरी जो वार्षिक महापूजा होती है । उसमें श्रद्धा भक्ति के साथ मेरे इस “देवी महात्म्य “(सप्तशती) का पाठ या श्रवण करना चाहिए । ऐसा करने से निःसंदेह मेरे कृपा प्रसाद से मानव सभी बाधाओं से मुक्त होता है ।

शक्ति “दर्शनानुसार “परब्रह्म से अभिन्न “आदिशक्ति पराम्बा “ की अराधना इसलिए की जाती है की वह साधक को भूक्ति और मुक्ति दोनो का अवदान दें । “देवी माहात्म्य” को सप्तशती के रूप में सभी जानते है। और यह भी जानते है की “सुमेधा ऋषि” ने राजा “सूरथ” और “समाधि” वैश्य को 700 श्लोकों में “महाकाली” , “महालक्ष्मी” और “महासरस्वती” के तीन चरित्र बताए है ।
नवरात्र
“नवरात्र” में दो शब्द है नव+रात्र। “नव” शब्द संख्या का वाचक है और रात्र का अर्थ है रात्रि -समूह -काल विशेष।इस नवरात्र शब्द में संख्या और काल का अद्भुत मिश्रण है । यह नवरात्र शब्द नवानां रत्रिनाम् समाहार: नवरात्रम् |
रात्राढनाहा: पुंसी.(पाणि० 2।4।29) तथा संख्या पूर्व रात्रम्। (क्लीबम ली ० सु ०131) से बना है । यों ही द्विरात्र, त्रिरात्र, पंचरात्रम् गणरात्रम् आदि द्विगु समासान्त शब्द है । इस प्रकार इस शब्द से जगत् के सर्जन- पालनरूप अग्निसोमात्मक द्वंद (मिथुन) होने की पुष्टि होती है ।

नवरात्र में अखंड दीप जलाकर हम अपनी इस नव संख्या पर रात्रि का जो अंधकार का आवरण छा गया है उसे अप्रत्यक्षत: उसे सर्वथा हटाकर “विजया” के रूप में अत्मविजय का उत्सव मनाते है । नव संख्या अखंड अविकारी एक रस ब्रह्म ही है । नौ का पहाड़ा में नौ ही नव अखंड ब्रह्म की तरह चमकते रहेंगे। जैसे -9,18,(1+8=9) ,27(2+7=9) ,81(8+1=9) और अंत में यही 9 “ख” ब्रह्म बन जाता है -90। इसी प्रकार वर्ष के सामान्यत: 360 दिनों को 9 की संख्या में बाटने पर 40 नवरात्र मिलते है । वैसे देवी भागवत में 4 नवरात्र 40 के दशमांश में निर्दिष्ट है । इस प्रकार वर्ष के 4 नवरात्र बन जाते है । चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ मास के शुक्ल पक्ष को प्रतिपदा से नवमी तक , जो हमारे चार पुरुषार्थों – धर्म, अर्थ , काम, मोक्ष बन जाते है। इस प्रकार अगर चार को दो में विलीन कर दें – विनियोग द्वारा अर्थ को धर्म में और काम को जिज्ञासा रूप बनाकर मोक्ष के अंतर्गत कर दें तो पुरुषार्थ के प्रतिक रूप में दो ही सर्वमान्य नवरात्र प्राप्त होते है । चैत्र नवरात्र और शारदिय् नवरात्र।

अश्विन में शरद् ऋतु में शीत तो चैत्र में ग्रीष्म – यह भी विश्व के लिए एक वरद मिथुन बन जाता है। एक से गेंहू (अग्नि) और दूसरे से चावल (सोम) ।इस प्रकार प्राकृति माता इन दोनों नवरात्रों में जीवन पोषक अग्निसोम के युगल का सादर आहार देती है ।फिर भी शक्ति और शक्तिमान् में अभेद दृष्टि के उपासक इसी शारदीय नवरात्र पर निर्भर करते है। शक्ति की उपासना के लिए नौ दिन इसलिए नियम दिए गए है । एक तो यह की दुर्गा माता नौ विद्या है अतएव नौ “दिन “रखे गए है ।
शक्ति के तीन गुण सत, रज और तम है इनको त्रिवृत करने पर नौ हो जाते है।
नवार्ण मंत्र और उसका व्याख्या
भगवती की उपासना में यह मंत्र शक्त्युपाशको का प्रधान अवलंबन है ।
मंत्र – ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
मनन से त्रान करने वाला यह मंत्र अत्यंत गोपनीय बन जाता है। “योगदर्शनकार” “जप” शब्द का अर्थ करते हुए कहते है की तज्जपस्तदर्पभावनम् (1/28)| अर्थात उस शब्द राशि के अर्थ की भावना ही उसका वास्तविक जप है। स्वाध्यादिष्टदेवतासम्प्रयोग: । अर्थात भावनात्मक मंत्र जप से इष्ट देव का साक्षात्कार होता है।
तदनुसार नवार्ण मंत्र के तीन बीजों का भाव
ऐं – यह सरस्वती बीज है । ऐ+बिंदु । “ऐ” का अर्थ सरस्वती है और बिंदु का अर्थ दुःख नाशक । अर्थात सरस्वती हमारे दुःख को दूर करें । यहां भुवनेश्वरी बीज के ब्याज से महालक्ष्मी संस्तुत्य है ।
अत्रसद्रुपात्मकमहालक्ष्मीरुपस्य भुवनेश्वरी मंत्रेण संबोधनमिति [ डामर व्याख्या भाष्यम ]
अत्र कल्पित – प्रपचनिरासाधिष्ठानता प्रोक्ता |
ऐं ज्ञान प्रदात्री एवम गुरु बीज मंत्र भी है । इसे वाक् बीज भी कहते है । वाणी की अधि देवता अग्नि है , सूर्य भी तेज रूप अग्नि ही है । सूर्य से दृष्टि मिलती है दृष्टि सत्य की पीठ है और यही सत्य परब्रह्म है । इस प्रकार ऐं का उदय अग्नि है । मणिपुर आयतन वाक् शक्ति का विशुद्ध चक्र विकास का जिहसाग्र भाग है ।इस बीज का जापक विद्वान हों जाता है । सरस्वतीरहस्योपनिषद् योगशिखोपनिषद् में कहा गया है की
ह्रीं
ह्रीं एकाक्षर महाबीज है । इनकी स्तुति नाना रूपों में प्रज्ञा पुरुष करते है । ह्रींकार, एकाक्षर , आदिरूप , मायाक्षर, कामद, अदिमंत्र, त्रैलोक्यवर्ण , परमेष्ठी बीज में रूप में प्रतिष्ठित है ।ह्रींकार स्वयं शक्ति स्वरूप साक्षात अर्हत् है। ह्रीं परम अस्तित्व है । ह्रीं में शब्द रचना की दृष्टि से “ह” “र” व्यंजन और ई स्वर है । चंद्र और विंदु उस पर निहित है । “ह्रीं” का संबंध “से” से है । इसका उदय आकाश है । अ+इ =ए ,ए+अ=ऐ । अकारो सर्ववाक्सैवा स्पर्शांतरस्थोश्ष्मा भिव्यर्र्ज्यामाना वह्नि नाना रूप भवति [ऐतरेय ब्राह्मण]। ह्रीं संस्थान से तदाकार आकृतियां प्रतिक्षण निकलकर आकाश मण्डल में प्रसारित रहती है । 14 वीं सदी के सामर्थ्य विद्वान ” जिनप्रभु सूरी कहते है ह्रीं कार 24 तीर्थकरों की जैनी शक्ति से संपन्न है । यह सिद्ध चक्रमय तथा देव गुरु धर्म के त्रिगुण संयुक्त पंचभूतात्मक बीजाक्षर है । ह्रीं कार ही देह रचना में “ह्रीं” 24 तीर्थकरों की शक्ति का प्रतीक है । उस पर आया हुआ काल चिन्ह सिद्ध शिखा का प्रतीक है ।इस पर आया हुआ विंदु सिद्ध आत्माओं के निराकार स्वरूप की अभिव्यक्ति है। ह्रीं कार की महिमा वेद , आगम और त्रिपीटकों ने गाई है ।तीनों परंपराओं में ह्रीं कि प्रतिष्ठा है । लव्धि ,शक्ति, लक्ष्मी समस्त ऐक्षिक और परलौकिक प्राप्त होता है |
क्लीं
ह्रीं कार की देह रचना और संस्थान से बनती है।आकार और संस्थान में निहित शक्ति” भावना” की है । ह्रीं की बाह्य संरचना रूपस्थ पिंडस्थ ध्यान का अंग है । पद को जब पुनः पुनः कानों में हल्का सा सुनाई दे ऐसा उच्चारण करते है । वह उपांशु जप है । जप स्थूल से सुक्ष्म और सुक्ष्म बनकर सजीव अर्थात कार्यकारी होने लगता है । ह्रीं कार को परम् ऐश्वर्य से सम्पन्न शक्ति के रूप में स्वीकार किया जाता है । स्वास्थ्य की दृष्टि से जप का प्रयोग करने पर इसका प्रभाव , दर्शन केंद्र, ललाट, आंख ,मुख और मस्तिष्क पर होता है ।साथ ही स्नायु पर विशेष प्रभाव पड़ता है। ह्रीं कार का जप अनुभूत सत्य है जिससे शरीर और चेतना प्रभावित होती है । ह्रींकार अंतरंग शक्ति है। ह्रींकार मंत्र भी है, तंत्र भी है और अपने आप में स्वतंत्र भी है ।
यह कृष्णबीज , कालीबीज एवम कामबीज माना गया है । इसमें क, ल ,ई और बिंदु चार अंश है जिनके अर्थ है कृष्ण या काम,सर्व श्रेष्ठ या इन्द्र या कमनीय तुष्टि और सूखकर अर्थात कमनीय कृष्ण हमें सुख और तुष्टि पुष्टि दें ।
अत्र आनन्दप्रधानमहाकालीस्वरुपस्य कामबीजेन संबोधनम् (डामर त०20, न० भा ०) । इस बीज में पृथ्वी तत्व की प्रधानता सहित वायु तत्व है ।
क= जलपीठ मूलाधार आयतन, काम संकल्प जनक होने से स्वाधिष्ठान , अनाहत तथा आज्ञा चक्र से संबंधित है । और वाक् शक्ति का संबंध संकल्पों से होता है अर्थात क्लीं का संबंध “ऐं” से है । क+ल+ई+नाद – बिंदु। क जल तो प्राण है ।सुरवाचक है ,प्राण ही वायु है ।वायु का कारण आकाश है । प्राण स्वयं ब्रह्म है । कं ,खं, प्राण तीनों ही ब्रह्म वाचक हैं। लं से पृथ्वी , पृथ्वी से अन्न ,अन्न से मन , मूलाधार पृथ्वी है ।अतः “क” जल से प्राण ,तप “ल” पृथ्वी से मन एवम प्राण+मन का विकास आज्ञाचक्र है और यही आनंद का स्थान है।
“आनंदो ब्रह्मेति व्यजानात” प्राण का निवास हृदय है । प्राण ही परमात्मा है । परमात्मा प्रेम स्वरूप है ।
ह्रद्द्रशेअर्जुन तिष्ठति “सर्वस्य चाहे हृदि सम्विष्टै” से सिद्ध ही है । आदित्यो वै प्राणा: आदि प्रमाणों से सिद्ध है की ये तीनों बीज परमात्मा वाचक है ।
चामुण्डायै
मां के मुख्य आठ रूप ब्रह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐंद्री , चामुण्डा आदि नामों से उल्लेखित है। प्रकृति का अर्थ चण्ड एवम निवृत्ति का अर्थ मुंड है। ये दोनो भाई है और काम और क्रोध के रूम में भी माने गए है। पाणिनी के चंडिकोये तथा मुंडी खण्डने धातुओं से इसकी उत्पत्ति हुई है। इसकी संहारक शक्ति का ही नाम चामुण्डा है जो स्वयं प्रकाशमान है। वो किसी आधार को लेकर प्रकाशित नहीं है इसलिए इनका कोई वाहन भी नहीं बताया गया है। भगवान नारायण के सत्व गुण से प्रकट एवम सदैव विद्यमान रहने वाली शक्ति ही यह पराम्बा है।
विच्चे
विच्चे का अर्थ समर्पण या नमस्कार है अर्थात ज्ञान की अधिष्ठात्रि देवी सरस्वती , सम्पूर्ण संकल्पों की देवी लक्ष्मी और सम्पूर्ण कर्मो की स्वामिनी महाकाली स्वरूप में सच्चिदानंद रूप ही हैं। उनके इस अभिन्न रूप को नमस्कार है । नमस्कार का अर्थ समर्पण है। व्याकरण में संप्रदान चतुर्थी का यही अर्थ है। इसीलिए नमः के यो में चतुर्थी का यही अर्थ है। इसी से नमः के यो में चतुर्थी होती है ।
नोट — यह सम्पूर्ण व्याख्या दिग्दर्शनम् के ज्योतिष् आचार्य भारवी सुबोध के द्वारा प्रदत है । ज्योतिष् विश्लेषण हेतु नीचे दिए गए मोबाइल नम्बर पर संपर्क कर सकते है ।
मो – 9113308417
टाइपिंग मिस्टेक के कारण लिखावट में कहीं त्रुटि हो सकती है ।
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