मेघों की मुन्तज़िर आँखें : वर्षा, बिहार और भारत की सभ्यता की मौन व्याकुलता

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— राकेश सिंह सोलंकी
लेखक | चिंतक | समाजसेवी | लोकद्रष्टा | ग्राम्य जीवन एवं भारतीय जनचेतना के अध्येता

आषाढ़ अपने उत्तरार्ध में प्रवेश कर चुका है। धूप की प्रखरता से तप्त धरती के अंग-अंग पर तिश्नगी की रेखाएँ उभर आई हैं। खेतों की मेड़ें सजी हुई हैं, धान की पौध तैयार है, कृषक का श्रम अपने चरम पर है, किन्तु आकाश की खामोशी गाँवों में एक अनकही बेचैनी और फ़िक्र का वातावरण निर्मित कर रही है।

करोड़ों किसानों की निगाहें बार-बार मेघमण्डल की ओर उठ रही हैं। यह केवल वर्षा की प्रतीक्षा नहीं है; यह आशा, आजीविका, सम्मान और भविष्य की प्रतीक्षा है।

भारतीय ग्राम्य जीवन में कहा जाता है—

“धान, पान नित स्नान।”

यह लोकवाणी किसी कृषि-विश्वविद्यालय की शोधपरक भाषा नहीं, बल्कि सदियों के अनुभव का निचोड़ है। धान की हरियाली, किसान की मुस्कान और गाँव की रौनक—तीनों का भाग्य जल पर आश्रित है। इसी कारण लोक में एक और उक्ति प्रचलित है—

“आषाढ़ हँसे, किसान रोए; सावन हँसे, किसान सोए।”

यदि आषाढ़ वर्षाविहीन हो जाए तो किसान की रात्रियाँ चिन्ता में कटती हैं; परन्तु यदि सावन उदार होकर बरस जाए, तो किसान को इत्मीनान प्राप्त होता है।भारत में वर्षा केवल एक ऋतु नहीं, बल्कि सभ्यता की धड़कन है। इसीलिए यह कहना सर्वथा समीचीन प्रतीत होता है कि—

“शहरों की समृद्धि उद्योगों से बढ़ती है, पर भारत की आत्मा आज भी वर्षा की पहली बूंद से मुस्कुराती है।”

यह पंक्ति कोई काव्यात्मक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक हक़ीक़त का उद्घोष है।

भारत की आत्मा कहाँ बसती है?

आज जब भारत विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में सम्मिलित होने की ओर अग्रसर है, जब महानगर गगनचुम्बी इमारतों, द्रुतगामी राजमार्गों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी नवाचारों से आलोकित हो रहे हैं, तब भी एक प्रश्न अनिवार्य रूप से हमारे समक्ष उपस्थित होता है—भारत की आत्मा कहाँ निवास करती है?

महात्मा गांधी ने कहा था— “भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है।”

यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वाधीनता आन्दोलन के काल में था। यदि नगर भारत का मुख हैं, तो ग्राम उसका हृदय हैं। यदि उद्योग उसकी भुजाएँ हैं, तो कृषक उसकी आत्मा है। यदि पूँजी उसकी शक्ति है, तो अन्नदाता उसका प्राण है।

भारत की सभ्यता किसी औद्योगिक क्रान्ति की देन नहीं है। यह खेतों, नदियों, ऋतुओं, पशुधन और कृषि-आधारित ग्राम्य जीवन के दीर्घ अनुभवों से निर्मित हुई है। सिंधु से लेकर गंगा तक, सरयू से लेकर सोन और कोसी तक, भारतीय संस्कृति का विकास जल और कृषि के इर्द-गिर्द हुआ है।

वैदिक वाङ्मय में वर्षा : ईश्वरीय अनुकम्पा का प्रतीक

भारतीय ऋषियों ने सहस्रों वर्ष पूर्व ही यह समझ लिया था कि जल के बिना जीवन की कल्पना भी असम्भव है।

ऋग्वेद के पर्जन्य सूक्त में कहा गया है— “पर्जन्यः पृथिवीं पिपर्ति।” (ऋग्वेद 5.83)

अर्थात् पर्जन्य सम्पूर्ण पृथ्वी का पोषण करता है।

एक अन्य वैदिक प्रार्थना है—”दिवो नो वृष्टिमेरय।”

हे देव! हमारे लिए वर्षा का संवर्धन कीजिए।

अथर्ववेद में कहा गया— “आपो हि ष्ठा मयोभुवाः।” (अथर्ववेद 1.5.2)

अर्थात् जल ही आनन्द, समृद्धि और जीवन का मूलाधार है।भारतीय मनीषा में वर्षा केवल जल का अवतरण नहीं है; यह ईश्वर की करुणा, प्रकृति की उदारता और लोकमंगल की अभिव्यक्ति है।

गीता का कृषि-दर्शन : अन्न, वर्षा और सृष्टि-चक्र

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था का जो सूत्र दिया, वह आज भी उतना ही वैज्ञानिक है—

“अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥” (भगवद्गीता 3.14)

यह केवल धार्मिक उपदेश नहीं है; यह सम्पूर्ण आर्थिक दर्शन का आधार है। अन्न से जीवन है। अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है और वर्षा के अभाव में सम्पूर्ण जीवन-चक्र प्रभावित हो जाता है।

वस्तुतः भारतीय चिंतन में कृषि केवल अर्थोपार्जन नहीं, बल्कि लोकमंगल का साधन है।

भारतीय साहित्य में मेघ और किसान

महाकवि कालिदास ने मेघदूत में मेघ को संवेदनाओं का दूत बताया। उनके लिए मेघ केवल जलराशि नहीं, बल्कि आशा, स्मृति और पुनर्मिलन के प्रतीक हैं।

मुंशी प्रेमचन्द का गोदान आज भी भारतीय किसान की वेदना का महाग्रंथ है। होरी केवल एक पात्र नहीं, बल्कि उस भारतीय किसान का प्रतिनिधि है जो निरन्तर श्रम करता है, परन्तु प्रकृति और व्यवस्था दोनों से संघर्ष करता रहता है।

फणीश्वरनाथ रेणु के मैला आँचल में गाँव की आत्मा वर्षा के साथ साँस लेती है। रेणु ने गाँव की मिट्टी, उसकी सोंधी गन्ध, उसके दुःख और उसकी उम्मीदों को जिस संवेदना से चित्रित किया, वह आज भी प्रासंगिक है।

राष्ट्रकवि दिनकर ने कहा था— “भारत का वैभव खेतों की हरियाली में बसता है।”

वास्तव में खेतों की हरियाली ही राष्ट्र की वास्तविक हरियाली है।

बिहार : जहाँ वर्षा केवल मौसम नहीं, नियति है

यदि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है, तो बिहार उसकी सबसे संवेदनशील अभिव्यक्तियों में से एक है। बिहार का कृषक आज भी मानसून पर अत्यधिक निर्भर है। धान राज्य की प्रमुख खरीफ फसल है और इसकी सफलता पर्याप्त वर्षा पर आधारित है।

इस वर्ष अनेक क्षेत्रों में मानसून की गति अपेक्षाकृत मंद रही है। रोपनी का समय सर पर है, किन्तु कई जिलों में अपेक्षित वर्षा नहीं हो सकी है। कहीं किसान डीज़ल पम्प के सहारे खेतों को बचाने का प्रयास कर रहा है, तो कहीं रोपनी स्थगित करनी पड़ी है।

ग्रामीण बिहार में इस समय एक विचित्र मंजर दिखाई देता है—

खेत तैयार हैं,पौध तैयार है,कृषक तैयार है,किन्तु आकाश अभी भी मौन है। यह मौन ही सबसे बड़ी बेचैनी है।

क्योंकि किसान जानता है कि यदि प्रारम्भिक वर्षा के बाद निरन्तर जल उपलब्ध नहीं हुआ, तो धान की पौध सूख सकती है।और यदि धान सूख गया, तो केवल एक फसल नष्ट नहीं होगी—पूरे वर्ष का अर्थतंत्र प्रभावित होगा।

गाँव में बारिश का अर्थ केवल पानी नहीं होता

महानगरों के लिए वर्षा कभी-कभी यातायात की समस्या हो सकती है; किन्तु गाँवों के लिए वर्षा जीवन का उत्सव है। गाँव में बारिश का अर्थ है—

सूखी मिट्टी की पहली सोंधी गन्ध।

तालाबों और पोखरों का भरना।

चरागाहों की हरियाली।

पशुधन की प्रसन्नता।

बच्चों की खिलखिलाहट।

गृहस्थी में लौटती रौनक

और सबसे बढ़कर किसान की आँखों में पुनः जागृत होती उम्मीद।

जब बादल धरती का मस्तक चूमते हैं, तब केवल खेत नहीं, बल्कि गाँव की आत्मा हरियाली ओढ़ लेती है।

अन्नदाता की व्यथा : अर्थशास्त्र से कहीं बड़ा प्रश्न

बहुधा यह कहा जाता है कि भारत कृषि प्रधान देश है।किन्तु यह अर्धसत्य है। सत्य तो यह है कि वर्षों की तपस्या धूप बिजली बारिश की परवाह किए बिना किसान अपना धैर्य धारण कर खेतों की फसल को अपने खून पसीनों से सींचता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में फसल का उचित मूल्य न मिलना, बाजार की अव्यवस्था, साधनों का आभाव, न्यूनतम समर्थित मूल्य आदि कई कारण उसे कृषि से पलायन की ओर धकेल रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी परंपरागत कृषि और पशुपालन से विमुख हो शहर का रुख करने को विवश है।

इसके बावजूद आज भी करोड़ों लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति कृषि से निर्धारित होती है। यदि किसान की आय घटती है, तो उसका प्रभाव ट्रैक्टर उद्योग, उर्वरक उद्योग, उपभोक्ता वस्तुओं, वस्त्र, लघु व्यापार और सेवा क्षेत्र तक दिखाई देता है।

कृषक की जेब खाली होने का अर्थ है—

ग्रामीण बाजार की मंदी।

उपभोग में गिरावट।

रोज़गार के अवसरों में कमी।

और अन्ततः आर्थिक विकास की गति में शिथिलता।

अतः मानसून केवल मौसम का प्रश्न नहीं है; यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का प्रश्न है।

जलवायु परिवर्तन : भविष्य का सबसे बड़ा संकट

आज विश्व जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकट से जूझ रहा है। कहीं अतिवृष्टि हो रही है कहीं अल्पवृष्टि। कहीं मानसून विलम्ब से पहुँच रहा है तो कहीं कुछ ही दिनों में विनाशकारी बाढ़ आ रही है।

बिहार इस दोहरी त्रासदी का साक्षी रहा है जहां राज्य के एक भाग में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न होती है, जबकि दूसरे भाग में बाढ़ जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर देती है।

कोसी, गंडक और बागमती की बाढ़ तथा दक्षिण बिहार की वर्षा-निर्भर कृषि—दोनों मिलकर राज्य के लिए एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करती हैं।

यह समय जल संरक्षण, आहर-पोखरों के पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई और जलवायु-अनुकूल कृषि नीति की माँग करता है।

कृषक की आँखें आकाश क्यों पढ़ती हैं?

क्योंकि किसान केवल बादलों को नहीं देखता। वह अपने बच्चों का भविष्य देखता है। वह अपनी बेटी की शिक्षा देखता है। वह ऋण चुकाने की सम्भावना देखता है। वह अपने परिवार की रोटी देखता है। वह आने वाले वर्ष की सुरक्षा देखता है।

कृषक की दृष्टि में मेघ केवल जल नहीं, बल्कि जीवन का आश्वासन हैं। इसलिए जब वर्षा नहीं होती, तब केवल धरती नहीं सूखती—मन सूखता है,उम्मीद सूखती है,और कभी-कभी भविष्य भी सूखने लगता है।

सभ्यता का स्मरण

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब विकास का पैमाना प्रायः शेयर बाज़ार, निवेश और औद्योगिक उत्पादन से निर्धारित किया जाता है। किन्तु हमें यह स्मरण रखना होगा कि कोई भी सभ्यता अपने अन्नदाता की पीड़ा की उपेक्षा करके दीर्घकाल तक समृद्ध नहीं रह सकती।

यदि खेत सूखेंगे, तो बाजार भी प्रभावित होंगे। यदि किसान निराश होगा, तो राष्ट्र की आत्मा भी उदास होगी।

क्योंकि सभ्यता का वास्तविक वैभव उसके नगरों की चकाचौंध में नहीं, बल्कि उसके गाँवों की मुस्कान में निहित होता है।

जब वर्षा मुस्कुराती है, तब भारत मुस्कुराता है

आज केवल धरती ही नहीं, करोड़ों किसानों की आँखें भी आकाश की ओर लगी हुई हैं। वे केवल बादलों की प्रतीक्षा नहीं कर रहे—

वे जीवन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

वे राहत की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

वे अपने श्रम के प्रतिफल की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

वे उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब पहली वर्षा की बूंद सूखी धरती को स्पर्श करेगी और मिट्टी से उठती सोंधी गन्ध सम्पूर्ण वातावरण को सुवासित कर देगी।

उस क्षण केवल खेत नहीं मुस्कुराएँगे। केवल तालाब नहीं भरेंगे।केवल पौध नहीं लहलहाएगी। उस क्षण भारत की आत्मा मुस्कुराएगी।

क्योंकि सत्य यही है—

शहरों की समृद्धि उद्योगों से बढ़ सकती है, पर भारत की आत्मा आज भी वर्षा की पहली बूंद से मुस्कुराती है।

जब बादल धरती का मस्तक चूमते हैं, तब केवल खेत नहीं, सम्पूर्ण भारतीय सभ्यता हरित आभा धारण कर लेती है।

लेखक परिचय

राकेश सिंह सोलंकी समकालीन भारतीय लोकचेतना, ग्राम्य-दर्शन एवं कृषक जीवन के मर्मज्ञ अध्येता, विचारक तथा सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित एक संवेदनशील कलमकार हैं। उनकी चर्चित कृति ‘संघर्ष और मानसिकता’ मानवीय अंतर्द्वन्द्व, जीवन-संघर्ष, सामाजिक यथार्थ और मनोभूमि की गहन तहकीक़ात प्रस्तुत करती है।

ग्रामीण जीवन की माटी, उसकी सांस्कृतिक विरासत, लोकानुभूति, कृषक-वेदना तथा भारतीय जनमानस की धड़कनों को उन्होंने केवल देखा ही नहीं, अपितु उन्हें अपने जीवन में आत्मसात् भी किया है। किसानों की मुश्किलात, ग्राम्य समाज की विषमताएँ, बदलते सामाजिक परिदृश्य और लोकजीवन की मुरझाती संवेदनाओं के प्रति उनकी तवज्जो सदैव विशेष रही है।

लेखक अपने समय की नब्ज़ को पहचानने वाले एक सजग मनीषी, समाजचिंतक, दार्शनिक, लोकद्रष्टा एवं जनपदीय चेतना के व्याख्याकार हैं। उनके चिंतन में भारतीयता की गहरी जड़ें, ग्राम्य सभ्यता की सुगन्ध, लोकसंस्कृति का माधुर्य तथा सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रखर बोध स्पष्ट परिलक्षित होता है।

राकेश सिंह सोलंकी का विश्वास है कि भारत की वास्तविक समृद्धि महानगरों की चकाचौंध में नहीं, बल्कि गाँवों की सादगी, खेतों की हरितिमा और अन्नदाता के चेहरे की मुस्कान में निहित है। उनका लेखन केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज की मौजूदा कैफ़ियत, ग्रामीण यथार्थ और जनजीवन की बेचैनियों का दस्तावेज़ भी है।

निःसंदेह, वे समकालीन भारत में ग्राम्य जीवन, लोकदर्शन, कृषक-चेतना और भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता की एक अमूल्य वैचारिक निधि तथा जनमानस की बौद्धिक पूँजी हैं।

Author

  • Kumar Ashwani

    Founder/CEO of Magadh Express, dedicated to amplifying public concerns and advancing transparent journalism with over a decade of experience in digital media, contributed to prominent platforms such as Dailyhunt and NewsDog. A certified Cyber Security Expert and Law Scholar, brings a rare combination of technical, legal, and journalistic insight to regional media. which reflects a strong commitment to credible, ethical, and impactful public interest reporting.

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