मीडिया के सवालों पर दांत निपोर रहे सहकारिता पदाधिकारी: औरंगाबाद में किसानों की बदहाली पर सहकारिता विभाग की ‘बेशर्म’ हंसी!
औरंगाबाद (मगध एक्सप्रेस न्यूज़)। एक तरफ बिहार का अन्नदाता कड़ाके की ठंड में अपनी खून-पसीने की कमाई—धान की फसल—को बेचने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है, वहीं दूसरी तरफ औरंगाबाद जिले के जिम्मेदार अधिकारी किसानों की बेबसी का मजाक उड़ा रहे हैं। जिले में धान खरीद की कछुआ चाल और पैक्सों की मनमानी ने किसानों की रातों की नींद उड़ा रखी है, लेकिन जब इन सवालों का जवाब मांगा जाता है, तो साहब के पास समाधान नहीं, बल्कि एक ‘बेशर्म मुस्कुराहट’ होती है।
किसानों के जख्मों पर प्रशासनिक नमक
मामला औरंगाबाद के जिला सहकारिता पदाधिकारी (DCO) से जुड़ा है। जब जिले के वरिष्ठ पत्रकारों ने किसानों की ज्वलंत समस्याओं और धान अधिप्राप्ति में हो रही देरी को लेकर उनसे सवाल पूछे, तो साहब की चुप्पी हैरान करने वाली थी। पदाधिकारी महोदय सवालों का जवाब देने के बजाय ‘दांत निपोरते’ नजर आए। यह हंसी सिर्फ एक हंसी नहीं, बल्कि उन हजारों किसानों के संघर्ष का अपमान है जो अपनी फसल को बिचौलियों के हाथों औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर हैं।
मंत्री जी! जरा अपने इन ‘मौन’ अफसरों को देखिए
केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह और बिहार के सहकारिता मंत्री प्रमोद कुमार (एवं वर्तमान विभागीय नेतृत्व) को संबोधित करते हुए यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या इन्हीं अफसरों के भरोसे “सहकारिता से समृद्धि” आएगी? जिस समय इन पदाधिकारियों को एसी कमरों से निकलकर खेतों और पैक्स केंद्रों पर होना चाहिए था, उस समय ये पत्रकारों के कैमरा के सामने किसानों की परेशानी पर सिर्फ दांत निपोर रहे है और मौन हैं।
मुख्य बिंदु जो प्रशासन को कटघरे में खड़ा करते हैं:
- मौन का मतलब क्या? जब धान खरीद में धांधली पर सवाल हुआ, तो पदाधिकारी चुप क्यों रहे?
- फील्ड से गायब: किसान परेशान हैं, लेकिन साहब दफ्तर में बैठकर फाइलों और हंसी-मजाक में व्यस्त हैं।
- संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: अन्नदाता की आंखों में आंसू हैं और जिम्मेदार अधिकारी के चेहरे पर ‘दांत निपोरती’ मुस्कान।
उचित कार्रवाई की मांग
औरंगाबाद के जागरूक नागरिकों और किसानों ने जिलाधिकारी (DM) और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मांग की है कि ऐसे संवेदनहीन पदाधिकारियों पर तत्काल प्रभाव से कड़ी कार्रवाई की जाए। जो अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है और किसानों के दर्द को मजाक समझता है, उसे पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
मगध एक्सप्रेस न्यूज़ प्रशासन से पूछता है— साहब, आपकी इस हंसी से किसानों का पेट भरेगा या उनकी फसल बिकेगी?
