विकास की ‘दहाड़’: औरंगाबाद के ‘रेड कॉरिडोर’ में अब बन रहा है ‘ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे’!कभी भाकपा माओवादियों का गढ़ रहा देव प्रखंड, आज बन रहा है ‘प्रगति का पथ’ –
गोलियों की तड़तड़ाहट की जगह ले रही हैं जेसीबी की गड़गड़ाहट
धीरज कुमार पाण्डेय
Magadh Express: यह सिर्फ एक सड़क निर्माण की कहानी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीत और एक इलाके के पुनर्जन्म की दास्तान है। बिहार के औरंगाबाद जिले का देव प्रखंड—खासकर इसका दक्षिणी हिस्सा—कभी देश के सबसे खूंखार ‘रेड कॉरिडोर’ का हिस्सा था। वह इलाका, जहां की रातें गोलियों की तड़तड़ाहट से और दिन भय के साए में गुजरते थे, आज उम्मीद और विकास की नई परिभाषा लिख रहा है।
अतीत का आतंक बनाम आज की शांति
देव प्रखंड के दक्षिणी पहाड़ी इलाके एक समय भाकपा माओवादी (CPI Maoist) संगठन का दुर्भेद्य अभेद्य किला थे। माओवादियों की समानांतर सरकार यहां चलती थी, जहां उनके फरमान ही कानून थे। मुठभेड़ें, पुलिस चौकियों पर हमला, स्कूलों को उड़ाना, और पुल-पुलियों को नष्ट करके सरकारी व्यवस्था को चुनौती देना यहां की दिनचर्या थी। स्थानीय लोग खौफ में जीते थे, और दिन के उजाले में भी अधिकारी या आम नागरिक यहां जाने से कतराते थे।

बदलाव का शंखनाद: जेसीबी की गड़गड़ाहट
सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, सुरक्षा बलों के अथक ऑपरेशन और स्थानीय लोगों के सहयोग ने अंततः इस आतंक के अध्याय को समाप्त कर दिया। माओवादी संगठन इन क्षेत्रों से सिमट चुका है, और इसी शांति के बल पर अब विकास की मजबूत रेखा खींची जा रही है।जिस जमीन पर कभी लैंडमाइन बिछाए जाते थे, उसी जमीन पर आज देश की महत्वाकांक्षी परियोजना वाराणसी-कलकत्ता ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे आकार ले रही है। “जिस मिट्टी पर कभी गोलियों की तड़तड़ाहट गूंजती थी, आज उसी वातावरण में जेसीबी, पोकलेन और हाईवा मशीनों की भारी दहाड़ गूंज रही है। यह दहाड़ सिर्फ मशीनों की नहीं है; यह विकास के संकल्प की, पिछड़ेपन को तोड़ने की और बेहतर भविष्य के निर्माण की दहाड़ है।”

उम्मीदों का एक्सप्रेसवे
यह एक्सप्रेसवे केवल कंक्रीट का ढांचा नहीं है। यह इस अति दुर्गम क्षेत्र को देश के प्रमुख आर्थिक केंद्रों से जोड़ रहा है। कृषि, व्यापार और स्थानीय उत्पादन को सीधे बड़े बाजारों तक पहुंचने का अवसर देगा। सड़क मार्ग बनने से सरकारी और प्रशासनिक पहुंच मजबूत होगी, जिससे यह इलाका फिर कभी नक्सलवाद की चपेट में नहीं आएगा। स्थानीय युवाओं के लिए अब बंदूक की जगह सड़क निर्माण और उससे जुड़े उद्योगों में सम्मानजनक रोजगार के द्वार खुल गए हैं।
औरंगाबाद का यह इलाका यह साबित कर रहा है कि दृढ़ इच्छाशक्ति से आतंक को विकास में और भय को आशा में बदला जा सकता है। ‘रेड कॉरिडोर’ का ‘ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे’ में बदलना पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है।
