रफीगंज का ‘बाजीगर’: दो बार की हार और ‘अपनों’ के धोखे के बाद कैसे ‘माननीय’ बने प्रमोद सिंह? पढ़िए इनसाइड स्टोरी
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औरंगाबाद: राजनीति में कहा जाता है कि उगते सूरज को सब सलाम करते हैं, लेकिन जो सूरज डूबने के बाद दोबारा उगने की जिद्द ठान ले, असली बाजीगर वही होता है। औरंगाबाद के रफीगंज में गूंजते नारों के बीच जो चेहरा सबसे ज्यादा चमक रहा है , वह प्रमोद कुमार सिंह का है।

यह जीत महज एक सीट की जीत नहीं है। यह कहानी है एक ऐसे नेता की, जिसे 2015 में लहर ने हराया, 2020 में गठबंधन ने ठुकराया, और 2025 में अपनी ही पुरानी पार्टी (लोजपा) ने ऐन वक्त पर धोखा दिया। लेकिन, प्रमोद सिंह ने साबित कर दिया कि अगर नेता का ‘बेस वोट’ मजबूत हो, तो सिंबल मायने नहीं रखता।
तीसरे संघर्ष में मिली ‘राजतिलक’ की कामयाबी

आज जब प्रमोद कुमार सिंह विधायक बनकर रफीगंज के जनता के बीच पहुंचे, तो नजारा देखने लायक था। यह स्वागत एक नेता का नहीं, बल्कि उस ‘धीरज’ का था जो उन्होंने पिछले 10 सालों में दिखाया। 2015 से 2025 तक का उनका सफर किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं रहा है।

फ्लैशबैक: जब 53 हजार वोटों ने नींद उड़ा दी थी
इस जीत की पटकथा 2025 में नहीं, बल्कि 2020 में ही लिख दी गई थी। याद कीजिए 2020 का वह चुनाव, जब कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया। प्रमोद सिंह निर्दलीय मैदान में कूद गए।

न झंडा, न पार्टी का फंड, फिर भी 53,000 से ज्यादा वोट! भले ही वे चुनाव हार गए, लेकिन उन्होंने जदयू के कद्दावर अशोक कुमार सिंह को घर बैठा दिया और सियासी पंडितों को बता दिया कि रफीगंज में “प्रमोद सिंह का अपना सिक्का चलता है।”

धोखा, दांव और जदयू की ‘मास्टरस्ट्रोक’

2025 चुनाव से ठीक पहले की कहानी सबसे दिलचस्प है। प्रमोद सिंह लोजपा में ‘घर वापसी’ कर चुके थे, प्रदेश महासचिव भी बने। टिकट पक्का माना जा रहा था। लेकिन राजनीति तो संभावनाओं का खेल है—लोजपा ने अंतिम समय में हाथ खींच लिया।
यहीं पर प्रमोद सिंह ने अपनी राजनीतिक परिपक्वता दिखाई। वे टूटे नहीं, बल्कि उन्होंने जदयू (JDU) का दरवाजा खटखटाया। जदयू को भी रफीगंज में एक जिताऊ चेहरे की तलाश थी और प्रमोद सिंह के पिछले निर्दलीय प्रदर्शन ने पार्टी को उन पर दांव लगाने पर मजबूर कर दिया।
नतीजा: जो जदयू 2015 और 2020 में उनकी विरोधी थी, उसी के ‘तीर’ ने प्रमोद सिंह को विधानसभा पहुंचा दिया।

आगे क्या?
राजद के मजबूत किले में सेंध लगाकर और तमाम बाधाओं को पार कर प्रमोद कुमार सिंह ने यह साबित कर दिया है कि वे ‘लंबी रेस के घोड़े’ हैं। जनता ने उन्हें सर-आंखों पर बिठाया है, लेकिन अब चुनौती है उन उम्मीदों पर खरा उतरने की, जिसके लिए रफीगंज की जनता ने 10 साल इंतजार किया।

औरंगाबाद की राजनीति में अब एक बात साफ है—रफीगंज में समीकरण चाहे जो भी हो, ‘फैक्टर’ सिर्फ प्रमोद सिंह हैं।