कार्तिक छठ महापर्व विशेष: देव सूर्य मंदिर का पौराणिक महत्व,जहां तीनों रूपों में विराजते है भगवान सूर्यदेव,विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका है षष्ठी देवी

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Magadh Express: कार्तिक छठ महापर्व के अवसर पर बिहार के औरंगाबाद जिले के देव स्थित ऐतिहासिक सूर्य मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह मंदिर न केवल अपनी अद्भुत शिल्पकला के लिए विख्यात है, बल्कि इसके साथ कई पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हुई हैं, जो इसे देश भर में प्रसिद्ध बनाती हैं।


देव सूर्य मंदिर की विशेषताएँ:

  • अद्वितीय स्वरूप: देव सूर्य मंदिर करीब 100 फीट ऊंचा है और काले पत्थरों को तराशकर बनाया गया है।
  • त्रिदेव के रूप में सूर्यदेव: मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां भगवान सूर्यदेव तीन स्वरूपों में विराजमान हैं। मान्यता है कि वे उदय काल में ब्रह्मा, मध्याह्न (दोपहर) में विष्णु और संध्या काल में महेश (शिव) के रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
  • निर्माण का श्रेय: माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण त्रेता युग में स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया था।
  • पश्चिमाभिमुख द्वार: सामान्यतः सूर्य मंदिरों के द्वार पूर्व की ओर होते हैं, लेकिन देव सूर्य मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर है। इससे जुड़ी एक कथा यह है कि औरंगजेब जब इसे तोड़ने आया था, तब पुजारियों के कहने पर उसने रातभर का समय दिया। तेज गर्जना के साथ रात में मंदिर का द्वार पूर्व से पश्चिम की ओर हो गया, जिससे औरंगजेब इसे तोड़ नहीं सका.

  • मंदिर निर्माण की पौराणिक कथा (राजा एल):
    मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार, त्रेतायुग में राजा एल ने इसका निर्माण कराया था। राजा कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। एक बार शिकार खेलते हुए जब वे देव पहुँचे और तालाब का जल ग्रहण किया, तो उनके शरीर का कुष्ठ रोग ठीक हो गया। रात में स्वप्न में उन्हें उसी तालाब में भगवान सूर्य की तीन स्वरूपी प्रतिमाएं (ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में) दबी होने का निर्देश मिला। राजा ने तालाब खुदवाकर ये प्रतिमाएं प्राप्त कीं और मंदिर का निर्माण कराकर उन्हें स्थापित किया, जो आज देव सूर्य मंदिर के नाम से विख्यात है।

  • सूर्यकुंड का विशेष महत्व:मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित तालाब को सूर्यकुंड कहा जाता है। छठ पर्व के दौरान इस कुंड का विशेष महत्व होता है। परंपरा के अनुसार, भक्त इसी कुंड में स्नान करने के बाद सूर्यदेव की आराधना करते हैं।
    छठ महापर्व का पौराणिक महत्व:छठ पर्व साल में दो बार (चैत्र और कार्तिक माह में) मनाया जाता है। यह चार दिनों का महापर्व पारिवारिक सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए मनाया जाता है।
    छठ पर्व से जुड़ी प्रमुख कथाएं:माता अदिति और छठी मैया: प्रथम देवासुर संग्राम में जब देवता असुरों से हार गए थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। छठी मैया के वरदान से ही उन्हें आदित्य (सूर्य) भगवान जैसा तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ, जिसने देवताओं को विजय दिलाई।
  • राम-सीता और राजसूर्य यज्ञ: एक मान्यता के अनुसार, 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने पर भगवान राम और माता सीता ने रावण वध के पाप से मुक्ति के लिए राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला किया। मुग्दल ऋषि के आदेश पर माता सीता ने कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छह दिनों तक सूर्यदेव की उपासना की थी।
  • महाभारत और सूर्यपुत्र कर्ण: हिंदू मान्यता के अनुसार, छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। इसे सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने शुरू किया था। कर्ण घंटों पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे, जिससे उन्हें सूर्य की कृपा प्राप्त हुई और वह महान योद्धा बने।
  • द्रौपदी का व्रत: जब पांडव जुए में अपना राजपाट हार गए थे, तब द्रौपदी ने यह व्रत रखा था, जिससे पांडवों को उनका सब कुछ वापस मिल गया था।
  • राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी: पुराणों के अनुसार, निःसंतान राजा प्रियव्रत ने महर्षि कश्यप के परामर्श पर पुत्रयेष्टि यज्ञ किया। महारानी ने मृत पुत्र को जन्म दिया। जब राजा उसे दफनाने जा रहे थे, तब आसमान से षष्ठी देवी आईं और मृत शिशु को स्पर्श कर जीवित कर दिया। इसके बाद से ही राजा ने अपने राज्य में यह त्योहार मनाने की घोषणा की। षष्ठी देवी को विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका माना जाता है।
    छठ महापर्व में सूर्य और छठी मैया का संबंध: लोक परंपरा के अनुसार, सूर्य देव और छठी मैया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई है।

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