उत्कृष्ट शिल्पकला का प्रतीक है बिहार का प्रसिद्ध देव सूर्य मंदिर
Magadh Express: बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित ‘देव सूर्य मंदिर’, जिसे ‘देवार्क’ के नाम से भी जाना जाता है, अपनी अनूठी और उत्कृष्ट शिल्पकला के लिए देश भर में प्रसिद्ध है। पत्थरों को तराश कर बनाया गया यह प्राचीन मंदिर भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है।

मंदिर का काल और पौराणिक महत्व:
इतिहासकार इसके निर्माण का काल छठी से आठवीं सदी के मध्य बताते हैं, जबकि पौराणिक मान्यताएं इसे त्रेता या द्वापर युग के मध्यकाल में निर्मित बताती हैं। इसे पारंपरिक रूप से कृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारा निर्मित बारह सूर्य मंदिरों में से एक माना जाता है। एक अन्य विवरण के अनुसार, इसे वाराणसी के लोलार्क और कोणार्क के साथ तीन प्रमुख सूर्य मंदिरों में से एक गिना जाता है।
छठ पर्व और देव माता अदिति की कथा:
मंदिर के साथ कई कथाएं जुड़ी हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है देव माता अदिति की। मान्यता है कि प्रथम देवासुर संग्राम में देवताओं की पराजय के बाद, देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए यहीं पर ‘छठी मैया’ की आराधना की थी। छठी मैया से वरदान पाकर, अदिति के पुत्र त्रिदेव रूप आदित्य भगवान हुए, जिन्होंने देवताओं को विजय दिलाई। कहा जाता है कि तभी से इस धाम का नाम ‘देव’ पड़ा और छठ पर्व का चलन भी शुरू हुआ। इस मंदिर को लेकर पुरुरवा ऐल और शिवभक्त राक्षसद्वय माली-सुमाली की कथाएं भी प्रचलित हैं।

स्थापत्य कला और विशेष आकर्षण:
मंदिर की नक्काशी उत्कृष्ट शिल्प कला का परिचय देती है। यह सूर्य मंदिर अन्य मंदिरों की तरह पूर्वाभिमुख (पूर्व की ओर मुख) न होकर पश्चिमाभिमुख है, जो इसे और खास बनाता है। इसका शिल्प उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर से मिलता-जुलता है।
श्रद्धालुओं का केंद्र:
यह मंदिर वर्ष भर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना रहता है। विशेषकर रविवार को यहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु हवन और पूजन के लिए आते हैं। हालांकि, यहाँ बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाए जाने वाले लोक आस्था के महापर्व छठ के अवसर पर भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि इस मंदिर से आज तक कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटा, और मनोवांछित फल की प्राप्ति के बाद वे कार्तिक या चैत्र छठ पूजा में सूर्य देव को अर्घ्य समर्पित करते हैं।
