वादों की होड़ में डूबा बिहार: चुनावी झूठ पर वोट मांगती पार्टियां!
सियासत का खेल अब वादों के फॉल्स रिटर्न का ज़रिया बन गया है। हर नेता, हर पार्टी दिन-ब-दिन ‘मुफ्तखोरी’ और ‘झूठे वादे’ का फॉर्मूला आजमा रही है। एक तरफ रोज़ नई घोषणाएं, दूसरी तरफ जनता के भरोसे की लगातार अनदेखी।
अर्थशास्त्रियों का साफ कहना है कि बिहार पहले से ही ₹3.33 लाख करोड़ के भारी कर्ज में डूबा है—इन चुनावी वादों की खातिर यह संकट और गहरा हो सकता है।
नीतीश कुमार हों या तेजस्वी यादव—दोनों तरफ से घोषणाओं और योजनाओं की बाढ़ आई हुई है, लेकिन असली सवाल है:
क्या यह सब मात्र ‘वोट खींचने’ की होड़ है या जनता के साथ सियासी छल?विपक्ष और विशेषज्ञों का तीखा हमला जेडीयू ने आरजेडी नेता तेजस्वी यादव को ‘झूठ का सौदागर’ करार दिया है।
यूपी के डिप्टी सीएम ने भी फर्जी वादों का जिक्र कर महागठबंधन को आड़े हाथों लिया।
विशेषज्ञों का कहना है, “इन लोकलुभावन घोषणाओं से राज्य की आर्थिक स्थिति खतरे में पड़ सकती है।
इस तरह के वादे असंभव हैं, राज्य की तिजोरी इन्हें झेलने की हालत में नहीं”। असली मुद्दों से भटकती राजनीति चुनावी माहौल में गरीबी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा, बाढ़, रोजगार—ये असली मुद्दे थे, लेकिन इस बार भी नेता इन्हें किनारे कर वोटों की ‘खरीद-फरोख्त’ कर रहे हैं।
जनता सोचने लगी है:क्या हर चुनाव में वादों का बिग बाजार खुला रहेगा?क्या विकास की उम्मीद हमेशा घोषणाओं के पन्नों में गुम होती रहेगी?
वादों से भरा पिटारा, सच्चाई से दूर राजनीति बिहार की जनता अब सवाल कर रही है—’क्या लोकतंत्र वोटों का मेला है या वादों का धंधा?’
जब जनता बदलाव नहीं, सच्चाई मांगने लगे, तब शायद इन झूठे वादों का खेल रुकेगा।
फिलहाल, बिहार चुनाव 2025 की असल तस्वीर में वादों की अंधी दौड़ और जन-धोखे की सियासत साफ नजर आ रही है ।