इंकलाब जिंदाबाद: एक क्रांतिकारी की अमर गाथा

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​1920 के दशक का भारत, ब्रिटिश हुकूमत की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। एक ओर महात्मा गांधी का अहिंसक आंदोलन पूरे देश में गूंज रहा था, तो वहीं दूसरी ओर एक युवा, उत्साही और क्रांतिकारी दिमाग ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए एक अलग ही रास्ता चुन रहा था। उस नौजवान का नाम था, भगत सिंह

​समाजवाद का सपना

​भगत सिंह केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नहीं लड़ रहे थे, बल्कि एक ऐसे भारत का सपना देख रहे थे जहाँ कोई भी किसी का शोषण न कर पाए। वे रूस की समाजवादी क्रांति से बहुत प्रभावित थे और मानते थे कि असली आज़ादी तब मिलेगी जब समाज में समानता और न्याय स्थापित हो।

इसी सोच के साथ, उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) कर दिया। इसका मकसद सिर्फ ब्रिटिश राज से मुक्ति नहीं, बल्कि एक शोषण-मुक्त, समाजवादी समाज की स्थापना था।

​बदला और साहस

​1928 में, जब ब्रिटिश पुलिस की लाठीचार्ज में महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई, तो भगत सिंह और उनके साथी चुप नहीं बैठे। उन्होंने इस अन्याय का बदला लेने का फैसला किया।  उन्होंने जॉन पी. सॉन्डर्स, एक सहायक पुलिस अधीक्षक, की हत्या कर दी। यह एक चेतावनी थी कि भारतीय नेताओं पर अत्याचारों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

बहरों को सुनाने की कोशिश

​1929 में, भगत सिंह ने एक और साहसिक कदम उठाया। उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंके। ये बम किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं थे, बल्कि “बहरों को सुनाने” के लिए थे।

बम फेंकने के बाद, उन्होंने भागने की कोशिश नहीं की, बल्कि वहीं खड़े होकर “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा लगाया और पर्चे बांटे। इन पर्चों में उनके विचारों और स्वतंत्रता की मांग का वर्णन था। उनका मकसद सिर्फ लोगों का ध्यान खींचना था ताकि वे जान सकें कि भारत के युवा अपनी आज़ादी के लिए क्या चाहते हैं।

​बलिदान जो अमर हो गया

​बम कांड के बाद, भगत सिंह ने जानबूझकर अपनी गिरफ्तारी दी। वे जानते थे कि यह मौका उन्हें अपने विचारों को पूरी दुनिया तक पहुंचाने का अवसर देगा। उन्होंने अपने मुकदमे को एक मंच की तरह इस्तेमाल किया, जहाँ से उन्होंने ब्रिटिश सरकार के अन्याय को उजागर किया और अपने समाजवादी आदर्शों का प्रचार किया। उनके निडर और अडिग रवैये ने लाखों भारतीयों को प्रेरित किया।

​23 मार्च, 1931 को, भगत सिंह को उनके साथियों, सुखदेव और राजगुरु के साथ फाँसी दे दी गई।  उनकी शहादत ने पूरे देश में क्रांति की एक नई लहर जगा दी। भगत सिंह का बलिदान आज भी भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी विचारधारा, जिसमें देशभक्ति, समाजवाद और साम्राज्यवाद-विरोध शामिल है, आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी। “इंकलाब जिंदाबाद” का उनका नारा आज भी हमें याद दिलाता है कि क्रांति कभी नहीं मरती।

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