मूँगफली में दाना नहीं, हम तुम्हारे मामा नहीं : आरक्षण नहीं, अवसरों के अभाव पर राष्ट्रीय विमर्श की आवश्यकता

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— राकेश सिंह सोलंकी : लेखक| चिंतक | समाजसेवी | लोकद्रष्टा | ग्राम्य जीवन एवं भारतीय जनचेतना के अध्येता

“मूँगफली में दाना नहीं, हम तुम्हारे मामा नहीं।” लोकजीवन में प्रचलित यह व्यंग्यात्मक उक्ति आज भारत की रोजगार व्यवस्था पर भी उतनी ही सटीक प्रतीत होती है। जब संसाधन सीमित हों और दावेदार असंख्य, तब संघर्ष व्यक्तियों के मध्य नहीं, व्यवस्था की संरचनात्मक विफलताओं के कारण उत्पन्न होता है।

वर्तमान समय में आरक्षण का प्रश्न देश के सबसे संवेदनशील सार्वजनिक विमर्शों में से एक है। किंतु विडंबना यह है कि अधिकांश चर्चाएँ इस प्रश्न तक सिमट जाती हैं कि आरक्षण किसे मिले और किसे न मिले। दुर्भाग्य से उससे भी अधिक मूलभूत प्रश्नों पर अपेक्षित गंभीरता से विचार नहीं होता।

जब किसी एक द्वार पर लाखों आकांक्षाएँ एक साथ दस्तक दे रही हों, तब केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि वह द्वार किसके लिए खुलेगा। उससे पहले यह भी पूछा जाना चाहिए कि इतने विशाल राष्ट्र में नए द्वारों के निर्माण का प्रयास कितना हुआ। यदि अवसरों का विस्तार ही नहीं होगा, तो वितरण का विवाद कभी समाप्त नहीं होगा।

यदि इस विषय को भावनाओं के स्थान पर तथ्यों और यथार्थ के आलोक में देखा जाए, तो भारत का रोजगार परिदृश्य स्वयं अनेक प्रश्न खड़े करता है। प्रतिवर्ष लगभग 90 लाख से 1.2 करोड़ युवा पहली बार रोजगार की खोज में श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं। दूसरी ओर केंद्र सरकार में कुल कर्मचारियों की संख्या लगभग 34–35 लाख तथा सभी राज्य सरकारों को मिलाकर लगभग 1.8 से 2 करोड़ है। किंतु प्रतिवर्ष नई स्थायी सरकारी नियुक्तियाँ सामान्यतः केवल 5 से 10 लाख के मध्य सीमित रहती हैं।

यह मात्र आँकड़ा नहीं, बल्कि एक कठोर यथार्थ है। जब लगभग एक करोड़ युवा प्रतिवर्ष रोजगार की पंक्ति में खड़े हों और स्थायी सरकारी अवसर कुछ लाख तक सीमित हों, तब प्रत्येक योग्य अभ्यर्थी को सरकारी सेवा उपलब्ध कराना गणितीय और प्रशासनिक—दोनों दृष्टियों से असंभव है। परिणामस्वरूप देश के अधिकांश युवाओं का भविष्य निजी क्षेत्र, उद्यमिता, कृषि, सेवा एवं स्वरोज़गार पर ही आधारित रहता है।

ऐसी स्थिति में संघर्ष केवल आरक्षण का नहीं, बल्कि अवसरों के अभाव का भी है। यदि किसी नाव में केवल दस व्यक्तियों के बैठने का स्थान हो और तट पर हजार लोग प्रतीक्षा कर रहे हों, तो विवाद केवल सीटों के वितरण का नहीं, बल्कि नावों की अपर्याप्त संख्या का भी होगा। यही भारत के रोजगार संकट का वास्तविक रूपक है।

यह भी स्मरण रखना आवश्यक है कि यह विमर्श किसी जाति, वर्ग अथवा समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह का माध्यम नहीं बनना चाहिए। लोकतंत्र में आरक्षण के पक्ष और विपक्ष—दोनों मतों का सम्मान होना चाहिए। किंतु यदि उद्देश्य समाधान है, तो बहस को कुछ अधिक मौलिक प्रश्नों की ओर मोड़ना होगा—

  • प्रतिवर्ष वास्तव में कितने नए रोजगार सृजित हुए?
  • उद्योग, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र ने कितनी नई नौकरियाँ उत्पन्न कीं?
  • कितने युवाओं को सफल उद्यमी बनने का अवसर मिला?
  • कौशल विकास योजनाओं का वास्तविक प्रतिफल क्या रहा?
  • सरकारी नौकरियों पर अत्यधिक निर्भरता आज भी क्यों बनी हुई है?

जब तक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं खोजे जाएँगे, तब तक आरक्षण पर होने वाला प्रत्येक विवाद मूल समस्या को छुए बिना केवल उसके लक्षणों पर बहस करता रहेगा।

विमर्श का केंद्र “आरक्षण” नहीं, बल्कि “अवसरों का सृजन

वास्तव में राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र “आरक्षण” नहीं, बल्कि “अवसरों का सृजन” होना चाहिए। यदि रोजगार के स्रोत विस्तृत होंगे, उद्योग सशक्त होंगे, उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलेगा, शिक्षा रोजगारोन्मुख होगी और आर्थिक विकास व्यापक होगा, तब अवसरों का दायरा स्वतः विस्तृत होगा तथा सामाजिक तनाव भी स्वाभाविक रूप से कम होंगे।समस्या यह नहीं कि अवसरों का वितरण कैसे हो; समस्या यह है कि अवसरों का सृजन अपेक्षित गति से क्यों नहीं हो रहा। जब अवसर सीमित होते हैं, तब प्रतिस्पर्धा संघर्ष का रूप धारण कर लेती है; किंतु जब अवसर प्रचुर होते हैं, तब प्रतिस्पर्धा नवाचार, समृद्धि और सामाजिक संतुलन का आधार बनती है।

अतः समय की माँग है कि आरक्षण पर होने वाली बहस को भावनात्मक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाकर रोजगार सृजन, औद्योगिक विस्तार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के व्यापक संदर्भ में देखा जाए। यही दृष्टिकोण देश को दीर्घकालिक समाधान की दिशा में ले जा सकता है।

और अंत में, उसी लोकव्यंग्य के साथ—

“मूँगफली में दाना नहीं, हम तुम्हारे मामा नहीं।”

अर्थ स्पष्ट है—जब व्यवस्था के पास अवसरों का वास्तविक भंडार ही सीमित हो, तब केवल उनके बँटवारे पर अंतहीन विवाद करना समाधान नहीं, बल्कि मूल प्रश्न से विमुख होना है। राष्ट्र को आज आरक्षण पर नहीं, अवसरों के विस्तार पर सर्वाधिक गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

लेखक परिचय

राकेश सिंह सोलंकी समकालीन सामाजिक, आर्थिक एवं लोकनीतिगत विमर्शों के गंभीर अध्येता, स्वतंत्र चिंतक तथा जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध लेखक हैं। उनकी लेखनी सामाजिक यथार्थ, रोजगार, शिक्षा, ग्रामीण भारत, कृषक जीवन और लोकचेतना से जुड़े प्रश्नों को तथ्यपरक एवं वैचारिक दृष्टि से प्रस्तुत करती है। वे मानते हैं कि किसी भी लोकतांत्रिक विमर्श का आधार भावनाओं के स्थान पर तथ्य, तर्क और दीर्घकालिक समाधान होना चाहिए। उनकी चर्चित कृति ‘संघर्ष और मानसिकता’ मानवीय अंतर्द्वंद्व, जीवन-संघर्ष, सामाजिक यथार्थ और मनोभूमि के विविध आयामों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

Author

  • Kumar Ashwani

    Founder/CEO of Magadh Express, dedicated to amplifying public concerns and advancing transparent journalism with over a decade of experience in digital media, contributed to prominent platforms such as Dailyhunt and NewsDog. A certified Cyber Security Expert and Law Scholar, brings a rare combination of technical, legal, and journalistic insight to regional media. which reflects a strong commitment to credible, ethical, and impactful public interest reporting.

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