नवार्ण मंत्र साधना एवं महत्व

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वैदिक मंत्रों और ध्वनियों का सही उच्चारण केवल धार्मिक कर्मकांडों में ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और मानसिक उन्नति के लिए भी महत्वपूर्ण है। हर ध्वनि के पीछे एक गहरा विज्ञान और ऊर्जा होती है, जिसका सही उच्चारण करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। लेकिन आज, कई लोग इन मंत्रों को केवल एक औपचारिकता के रूप में लेते हैं और उनके सही उच्चारण और व्याकरण का महत्व नहीं समझते, जिससे उनका असली प्रभाव क्षीण हो जाता है।

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Editorial by Amit Kumar (Intern) : वैदिक मंत्रों और ध्वनियों का सही उच्चारण केवल धार्मिक कर्मकांडों में ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और मानसिक उन्नति के लिए भी महत्वपूर्ण है। हर ध्वनि के पीछे एक गहरा विज्ञान और ऊर्जा होती है, जिसका सही उच्चारण करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। लेकिन आज, कई लोग इन मंत्रों को केवल एक औपचारिकता के रूप में लेते हैं और उनके सही उच्चारण और व्याकरण का महत्व नहीं समझते, जिससे उनका असली प्रभाव क्षीण हो जाता है। इस बावत दिग्दर्शनम् के ज्योतिष आचार्य भारवि सुबोध ने नवार्ण मंत्र का सही उच्चारण और नवार्ण मंत्र से पहले ऊँ लगाने को लेकर विस्तृत जानकारी दी है |

आइये इस लेख में जानेगे की नवार्ण मंत्र से पूर्व ऊँ लगाना चाहिए या नहीं

आचार्य भारवी सुबोध कहते है की नवार्ण मंत्र और प्रणव का संयोग दुर्गा सप्तशती के पृथक पृथक कृतियों में नवार्ण मंत्र से पूर्व “ऊँ” लगाकर इसे ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे से रेखांकित किया गया है | अनेक शास्त्रकारों और दुर्गा सप्तशती के प्रतिष्ठित विद्वानों के मध्य यह तर्क का विषय बना हुआ है की संयोग करना चाहिए की नहीं ? मंत्र के उद्धार वाक्य में जो जो क्रम लिखा रहता है वही साधको को मंत्र स्वरुप के लिए उपादेय होता है , और जिस मंत्र के उद्धार वाक्य में जो नहीं है उसे जोड़ना हानिकारक होता है | मंत्र के उद्धारकर्ता शास्त्रकारों ने  मंत्र का जो स्वरुप बताया है वैसा ही साधकों को उपयोग में लाना चाहिए |उसमे न्युनाधिक कर लेना ठीक नहीं है |

महर्षियों ने नवार्ण से पहले प्रणव का क्या बताया है सिद्धांत


       कुछ शास्त्रकरों का मत है – प्रणव तो वेदों का मूल है ,प्रणव बिना मंत्र ही क्या ? विशेष मंत्र जिन्हें ऋषियों ने स्वरुप निर्णय कर लिखा है और जिसके स्वरुप में ॐकार की आज्ञा नहीं है ,उसमे बिना ॐकार के ही वह  मंत्र सिद्धिदाता और फलप्रद होते है , प्रणव लगाने से नहीं होते | ऐसा न समझकर अगर ऊँ भी जोड़ा जाये तो मंत्र का स्वरुप बदलकर और ही फल या कुफल देते है और देंगे |वेद में छंद – गायत्री ,उष्णिक ,अनुष्टुप ,वृहती ,पंक्ति ,त्रिष्टुप और जगती ये सात प्रधान है | फिर इनके अनेक भेद वैदिक पिंगल [छंद शास्त्र ] में बताये गए है | उन सब को मंत्र बनाने के लिए ऊँकार लगाने का आदेश है , न की बने हुए मंत्र पर लगाने का | इसके अतिरिक्त वेदों में रिक ,छंद ,यजु,समाधी शब्द विशेष परिभाषा से बद्ध है ,तो भी ये शब्द छंद : सामान्य में गिने जाते है | छंद का मंत्रत्व ऊँकार से भी प्राप्त होता है , इसी कारन यह निर्देश हुआ है |सामान्य छंद में भी ऊँकार लगाने से वह मंत्र बन जाता है |मंत्र शब्द का अर्थ है गुप्त भाषण करना जबकि छंद का यह अर्थ नहीं है | तो सामान्य ,छादन रूप के अर्थ वाले छंद के पूर्व ऊँ लगाने से  वह गुप्त भाषण जप रूप कर्म हेतु मंत्र बन जाता है ऐसा महार्षियो का सिद्धांत प्रणव लगाने का वेदों में बताया गया है |शास्त्र तत्व को समझने के लिए प्रणव पर विचार आवश्यक है |


 

ऊँकार को नवार्ण मंत्र से पूर्व लगाना उपयुक्त है या नहीं

प्रणव शब्द  से वैदिक काल प्रवृत हुआ है| यह किसी संज्ञा का विशेषण स्वरुप है | जैसे प्र +णु स्तुतौ” अदादि   परस्मैपद अनित क्रिया से [ऋदोरप 3|3|57] यह व्याकरण सूत्र लगाकर अप् प्रत्यय हुआ  और प्र +ण +अप्  ऐसा बना | प को  हत किया और प्र+न्+अ  रहा |[धातुओं में ण को न सर्वत्र माना गया है | इस नियम से णु को नू परन्तु  {उपसर्गात [8\4|14} से पुनः ण त्व विधान होकर प्र +णु +अ रहा और फिर गुण संधि से प्र +नो +अ रहा | ऊँकार को एचोयवायव: इस सूत्र से आदेश किया, तब प्रणव शब्द बना | प्रणव की निरुक्ति शास्त्रकारों ने ऐसी ही बताई है |प्रकर्षेण नुयते स्तूयते इति प्रणवः ,अर्थात जो बढ़कर उत्कर्ष से स्तवन किया जाता है ,वह प्रणव है ।,स्तवन या स्तुति अर्थात प्रसंशा | इस प्रकार ऊँकार सर्वोत्कर्ष स्तुतिकरण अर्थ वाला शब्द है | ऊँकार के सामान सर्वोत्कर्ष स्तुति वाला प्रणव शब्द ह्रींकार निगमोमागम में बताया गया है |

देवी भागवत में स्वयं भगवती भुवनेश्वरी इंद्र से कहती है की ऊँ जो एकाक्षर ब्रह्म रूप है ,इसी को वेद ह्रीं मय अर्थात ह्रींकार कहते है | ऊँ और ह्रीं ये दोनों बीज मेरे मुख्य मंत्र है |माया भाग और ब्रह्म भाग मुझमे ही है, मैं इन दो भागों से जगत की सृष्टि करती हूँ | इसी कारन मेरे बीज मंत्र भी दो है ,पहला भाग सच्चिदानंद रूप है और दूसरा भाग माया प्रकृति संज्ञक है वह माया पराशक्ति है और मैं शक्ति मति इश्वरी परमेश्वरी हूँ | मेरे ये दोनों बीज मंत्र प्रणव कहलाते है । क्योंकि इस  में प्रकर्ष की स्तुति होती है ये बीज मेरे उत्कर्ष के धोतक है   |

साम वेद में इन बीजों का नाम उद्गीथ आया है [ देखिये” छांदोग्य उपनिषद ओमित्ये-दक्षरमुद्गीथमपासित”] और आगे चलकर य: उद्गीथ स:प्रणवः |य: प्रणवःस उद्गीथ  {छान्दोग्य ,प्र ०अ०] ऐसे ही ऊँ ब्रह्मोति ,ह्रीं ब्रह्मोति ,दोनों ही भाग शक्ति विशेष ब्रह्म के वाचक है | ऊँकार को ब्रह्म प्रणव  और  ह्रींकार को माया या प्रकृति प्रणव कहते है |माण्डुक्योपनिषद में ऊँकार की  महिमा बताते हुए इसके तीन पाद बताये गए है | अ -उ -म =ऊँ के तीन वर्णों को ही तीन पाद माना गया है और इन्ही तीन वर्णों को मात्रा मानते है | आगे विभिन्न मतांतरो के अंतर्गत ऊँकार की  मात्राएँ भिन्न भिन्न मानी गयी है |कोई आचार्य मात्रा , कोई  मात्रा तो कोई मात्रा और कोई कोई तो बढ़ते बढ़ते ६४ मात्रा तक मान गए है | ऊँकार की तीन मात्रा ही तीन पाद और मात्राएँ है | अकार जागृत ,द्वितीय ऊँकार स्वप्न और तृतीय मकार सुषुप्ति का रूप है | सुषुप्ति को अर्ध मात्रा मानते है | अतः ऊँकार का ढाई मात्रा का स्वरुप है | चार मात्राएँ मानने वाले परषारादि ऋषि कहते है की  अकार स्थूल विराट  स्वरुप ,उकार हिरन्यगर्भ स्वरुप और मकार कारन अव्याकृत रूप , चतुर्थी मात्रा विन्दु रूप चैतन्य पुरुष है |वशिष्ठ आदि ऋषि ऊँकार में साढ़े चार मात्राएँ मानते है | कोई पांच कोषों को इसकी मात्रा मानकर पंच् मातृक कहते है |

ऊँकार का स्वरुप विश्लेष्ण: इस तरह होता है  अ+उ +म् | इन तीन वर्णों में दो स्वर और एक व्यंजन है | स्वरों में प्रथम अकार हर्स्व  है [ एकमात्रो हर्स्व : ] | उकार भी हर्स्व है और म व्यंजन होने के कारन आधी मात्रा का रूप रखता है [ व्यंजन चार्ध मात्रकम] | सब मिलाकर ऊँकार की  ढाई मात्रा सिद्ध होती है |

ह्रींकार का स्वरुप विश्लेष्ण –ह +र +ई+म  , ह और  र व्यंजन की अर्ध मात्रा ई दीर्घ स्वर – २ मात्रा [द्विमात्रो दीर्घ :] |म  अर्ध मात्रा व्यंजन | सब मिलाकर साढ़े तीन मात्रा होती है | ह्रीं प्रणव तुरियातितम अर्थात त्रिगुनावस्था के पार |वास्तव में ऊँकार प्रकृति दर्शन प्रधान है और ह्रींकार ब्रह्म दर्शन चैतन्य प्रधान | माण्डुक्योपनिषद  कहता है ओमित्ये द्क्षरमिदं सर्वम | अन्य श्रुतियां भी कहती है ऊँकार एवेदं सर्वम | प्रकृति का प्रपंच ऊँकार ही है | सामवेद छान्दोग्य उपनिषद में भी ह्रींकार का आदेश हुआ है ,यथा —अग्नि ह्रींकारो ,मनो ह्रींकार ,प्रजापति ह्रींकार ,प्राणों ह्रींकार  | ह्रींकार को सर्व प्रथम भगवान् विष्णु के लिए भगवती भुवनेश्वरी  ने उपदिष्ट  किया | भगवती ने भगवन विष्णु को रेफ संयुक्त और दीर्घ स्वर करके दिया | तभी से यह ह्रींकार स्वरुप में प्रवृत हुआ | मूल वैदिक ह्रींकार ही ह्रीं का स्वरुप है | अथर्व श्रुति में और देव्यर्थोपनिषद में स्पष्ट रूप से कहा गया है की इसका रूप भगवती भुवनेश्वरी द्वारा परिष्कृत किया हुआ है |

यथा – वियादिकारसंयुक्तं ,वीतीहोत्र समन्वितम ।अर्धेंदुलसितम देव्या ,विजम सर्वार्थ साधकं |एवमेकाक्षरम् मंत्रम ,यतय:शुद्ध चेतस: ।ध्यायन्ति परमानन्द ,मया ज्ञानाम्बू राशय:||

प्रधान रूप से  अथर्व श्रुति देव्याथर्व शीर्ष में नवार्ण का उद्धार मिलता है |

वांग् -माया ब्रह्म सुस्तस्मात,षष्ट वक्र समन्वितम । सूर्यो वामा श्रोत विन्दु संयुक्ताष्टीटा तृतीयक: ,नारायेंण संयुक्तो वायुश्चाधरसंयुत:|विच्चे नवार्नकोंग्याँस्यात महदानंद दायक 😐

जब मन्त्र शास्त्र स्वयं निषिद्ध करता है तब ऊँकार लगाने का अनुरोध व्यर्थ हो जाता है

अर्थात श्रुति मंत्र का यह स्वरुप बताती है -ऐ ह्रीं क्लीं |यहाँ आदि में ऊँकार का निर्देश नहीं है |जिसे ब्रह्म विद्या का मंत्र कहा गया है | इस ब्रह्म विद्या के ऊपर प्रकृति वाचक प्रणव का क्या प्रयोजन है |मेरु तंत्र में भी ऊँकार का निर्देश नहीं मिलता है |वाग -लज्जा -कामबिजानी चामुण्डायैपदं वदेत विच्चे नवार्ण मन्त्रोय ,शक्ति  मन्त्रोत्र मोतम:| इसी प्रकार सप्तशती सर्वस्वाकार ने भी यही उद्धार उल्लिखित  किया है और पूर्वोक्त देवीअथर्व शीर्ष में भी | दोनों में प्रणव नहीं है | मेरु तंत्र में सप्तशती को छोडकर अनेक मन्त्रों को उनके देवताओं के शाप का जिक्र आया है 193 वां पद में स्पष्ट है ओंकारयुतश्चामुण्डा सापतो मनु;| निर्विज इति संशप्रो,नित्यं नैराश्य  कारक: | अर्थात नवार्ण में यदि लगाये तो वह चामुण्डा के शाप से निर्विज [पराक्रम शून्य ] हो जाता है और निराशा ही पैदा करता है | इस प्रकार जब मन्त्र शास्त्र स्वयं निषिद्ध करता है तब ऊँकार लगाने का अनुरोध व्यर्थ हो जाता है | नवार्ण मंत्र बीज और वाक्य दोनों का होने से मिश्र संज्ञक हो जाता है | बीजात्मक नवार्ण भी चामुण्डा मंत्र है पर यह पुरे भारत वर्ष में प्रचलित न होकर केवल दक्षिण भारत में प्रचलित है |यह प्रसंग दुर्गोपासना कल्पद्रुम में आता है , जहाँ नवार्ण मंत्र दिया है वहां नागो जी भट्ट ने ये बताया है और उसमे प्रणव[ऊँ ] भी बताया है | इसको देखने से ही सामान्य ज्ञान वालों ने जो विशेषता का विवेचन नहीं कर सकते थे इधर उत्तर भारत में इसका प्रचार कर दिया है | पिछले विचार करने वाले भी गतानुगतिक न्याय से वैसा ही करने लगे | वह बिजात्मक नवार्ण ऐसा है |

ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं क्लीं ह्रीं क्लीं नम:||

अतः सार ऐसा ही ज्ञात होता है की नवार्ण मंत्र से पहले ऊँ नहीं लगाना चाहिए |बीजों के न्यास आदिमें ऊँ  लगाने का विधान पाया जाता है |अतः न्यास करते समय प्रणव योजना उचित है |आचार्यों की आज्ञां है की मातृका न्यास करते समय वर्ण के पूर्व ऊँ और अंत में नमः लगाना चाहिए |

Author

  • Kumar Ashwani

    Founder/CEO of Magadh Express, dedicated to amplifying public concerns and advancing transparent journalism with over a decade of experience in digital media, contributed to prominent platforms such as Dailyhunt and NewsDog. A certified Cyber Security Expert and Law Scholar, brings a rare combination of technical, legal, and journalistic insight to regional media. which reflects a strong commitment to credible, ethical, and impactful public interest reporting.

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