पार्टी बचाने के लिए ‘विषपान’ करना पड़ा…” उपेंद्र कुशवाहा का बड़ा दर्द; बेटे को गद्दी सौंपने पर विरोधियों को दिया करारा जवाब

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Magadh Express | पटना

​”समुद्र मंथन से अमृत और ज़हर दोनों निकलता है। कुछ लोगों को तो ज़हर पीना ही पड़ता है…” यह अल्फाज़ हैं रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के। अपनी पार्टी के अहम पदों पर परिवार के सदस्य (बेटे) को बैठाने के बाद उठे ‘परिवारवाद’ के तूफ़ान पर कुशवाहा ने चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने साफ़ कर दिया है कि यह फैसला उनके लिए किसी ‘जहर’ (विषपान) से कम नहीं था, लेकिन पार्टी के वजूद को बचाने के लिए यह ‘कड़वी घूंट’ पीना जरुरी था।

“इतिहास गवाह है, लोग जीते और निकल लिए…”

उपेंद्र कुशवाहा ने अपने फैसले के बचाव में पार्टी के पुराने जख्मों को कुरेदा है। उन्होंने कहा कि अतीत में ऐसे कड़वे अनुभव रहे हैं जब पार्टी ने संघर्ष किया, सांसद-विधायक बनाए, लेकिन वे लोग “जीते और अपनी राह निकल लिए।” नतीजा यह हुआ कि पार्टी की झोली खाली रह गई और संगठन फिर से शून्य पर आ खड़ा हुआ।

​कुशवाहा ने दो टूक कहा, “इतिहास से सबक लेते हुए मुझे लगा कि अगर यह कड़ा फैसला नहीं लिया, तो कोई दूसरा विकल्प पार्टी को फिर से शून्य पर पहुंचा सकता है।”

आलोचकों को ‘शायराना’ अंदाज में जवाब

परिवारवाद का आरोप लगाने वाले विरोधियों और आलोचकों पर पलटवार करते हुए कुशवाहा ने एक शेर के जरिये अपनी बात रखी:

“सवाल ज़हर का नहीं था, वो तो मैं पी गया।

तकलीफ़ उन्हें तो बस इस बात से है कि मैं फिर से जी गया।।”

​उन्होंने कहा कि स्वस्थ आलोचना का वे स्वागत करते हैं, लेकिन जो आलोचनाएं ‘दूषित मानसिकता’ से की जा रही हैं, वे केवल आलोचकों की नीयत दिखाती हैं।

“मेरा बेटा फेल विद्यार्थी नहीं है”

अपने बेटे दीपक प्रकाश की योग्यता पर उठते सवालों को खारिज करते हुए कुशवाहा ने कहा कि, “वह विद्यालय की किसी कक्षा में फेल विद्यार्थी नहीं है।” उन्होंने बताया कि दीपक ने मेहनत से कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है और उसे परिवार से अच्छे संस्कार मिले हैं।

​कुशवाहा ने लोगों से अपील की है कि किसी की योग्यता को उसके ‘सरनेम’ या ‘परिवार’ से नहीं, बल्कि उसकी काबिलियत से तौलें। उन्होंने कहा, “उसे थोड़ा वक़्त दें और अपने को साबित करने का इंतज़ार करें।”

बड़ी बात:

उपेंद्र कुशवाहा का यह बयान स्पष्ट करता है कि बिहार की राजनीति में अब वे ‘आदर्शवाद’ की जगह ‘व्यावहारिकता’ (Pragmatism) और पार्टी की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं, भले ही इसके लिए उन्हें अपनी पुरानी छवि दांव पर क्यों न लगानी पड़े

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