बिहार में ‘परिवारवाद-मुक्ति’ की शपथ!जहाँ बेटा-बेटी ही बदलेंगे राजनीति का चेहरा—क्योंकि अब वही राजनीति हैं!
पटना: बिहार की राजनीति में परिवारवाद को खत्म करने की सबसे बड़ी मुहिम आज उन्हीं लोगों ने छेड़ी, जिनकी राजनीतिक पहचान ही उनके परिवार से शुरू होकर उनके परिवार पर ही खत्म हो जाती है। मंच पर एक-एक कर वे सभी चेहरे आए, जिनके नाम से पहले पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व विधायक का ‘वरदान’ लगा है—और जिन्होंने ईश्वर की शपथ लेकर घोषणा की कि वे बिहार की राजनीति से परिवारवाद मिटा देंगे।
लेकिन भीड़ में खड़े लोग बस मुस्कुरा रहे थे—क्योंकि यह वही ‘राजनीतिक वारिस’ थे जिनकी पहचान आज भी पिता-माता के ओहदों से ही चमकती है।
परिवारवाद खत्म करने की शपथ पढ़ने वाले ‘युवराजों’ की सूची भी पढ़ लीजिए—
- सम्राट चौधरी – पूर्व मंत्री शकुनि चौधरी के पुत्र
- दीपक प्रकाश – पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा व विधायक स्नेहलता कुशवाहा के पुत्र
- अशोक चौधरी – पूर्व मंत्री महावीर चौधरी के पुत्र
- नितिन नबीन – पूर्व विधायक नवीन किशोर सिन्हा के पुत्र
- संतोष सुमन मांझी – पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के पुत्र
- रमा निषाद – पूर्व केंद्रीय मंत्री कैप्टन जय नारायण निषाद की पुत्रवधु, पूर्व सांसद अजय निषाद की पत्नी
- श्रेयसी सिंह – पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व सांसद पुतुल कुमारी की पुत्री
- विजय चौधरी – पूर्व विधायक जगदीश प्रसाद चौधरी के पुत्र
और इसी वंशावली के बीच गूंजती रही एक आवाज़—
“ईश्वर की शपथ लेता हूँ कि बिहार की राजनीति से परिवारवाद समाप्त करूँगा।”
बिहार की जनता भी कह रही है—
“अरे वाह! जिनके हर परिचय में परिवारवाद की पूर्ण आहुति लगी रहती है, वही आज इसकी शव-यात्रा निकाल रहे हैं!”
ये वो नेता हैं जिनका राजनीतिक भविष्य जन्मपत्री में पहले ही लिख दिया गया था, जिनकी टिकट परिवार की विरासत के साथ पैक होकर आती है, और जो अब परिवारवाद पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करने की बात कर रहे हैं।
जनता का सवाल सीधा है—
क्या बिहार में परिवारवाद की समाप्ति होगी?
या फिर बस शपथ-पत्र बदल जाएगा, चेहरा वही रहेगा?
“बिहार में परिवारवाद नहीं, परिवार ही राजनीति है! अब शपथ से क्या होगा—साहब, सच तो टिकट और ताजपोशी से ही उजागर होता है!”