औरंगाबाद में NDA की ‘अग्निपरीक्षा’, दो सीटों पर दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर! ‘ बेटों के लिए पिता कर रहे ‘गोटी सेट’, जातीय समीकरण बिगाड़ रहा खेल

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Magadh Express ​औरंगाबाद विधानसभा चुनाव का प्रचार जैसे-जैसे अपने अंतिम दौर में पहुँच रहा है, औरंगाबाद जिले का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। यहाँ का चुनावी दृश्य किसी सामान्य राजनीतिक जंग जैसा नहीं, बल्कि एनडीए के दो सबसे बड़े दिग्गजों की प्रतिष्ठा का अखाड़ा बन गया है। जिले की दो विधानसभा सीटों – औरंगाबाद सदर और नबीनगर – पर दो कद्दावर पिता अपने बेटों के लिए ‘राजनीतिक जमीन’ तलाशने में जी-जान से जुटे हैं, लेकिन ‘बाहरी’ होने का ठप्पा और ‘अपनों’ की बगावत ने उनकी राह मुश्किल कर दी है।​यह स्थिति एनडीए के शीर्ष नेतृत्व के लिए किसी सिरदर्द से कम नहीं है, जहाँ दो दिग्गज अपनी-अपनी सीटों पर उलझे हुए हैं और उनकी पूरी साख दांव पर लगी है।


​सदर सीट: गोपाल नारायण सिंह का ‘मिशन पुत्र’
​एक ओर औरंगाबाद सदर विधानसभा सीट है, जहाँ बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और एक बड़ा नाम, गोपाल नारायण सिंह, अपने बेटे त्रिविक्रम नारायण सिंह के लिए खुद मैदान में हैं। एनडीए प्रत्याशी त्रिविक्रम को जीत दिलाने के लिए गोपाल नारायण सिंह पर्दे के पीछे से हर ‘गोटी सेट’ करने में लगे हैं। वे अपनी पुरानी राजनीतिक बिसात के हर मोहरे को सक्रिय कर चुके हैं और बेटे के प्रचार में पसीना बहा रहे हैं।लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती ‘बाहरी उम्मीदवार’ का वह तमगा है, जिसे विपक्ष जोर-शोर से उछाल रहा है। स्थानीय स्तर पर हो रहा जातीय विरोध उनकी रणनीति को कमजोर कर रहा है।


​नबीनगर: आनंद मोहन की ‘प्रतिष्ठा’ का सवाल
​दूसरी ओर, नबीनगर विधानसभा सीट का हाल भी कुछ ऐसा ही है। यहाँ एनडीए के एक और दिग्गज और बाहुबली नेता के तौर पर मशहूर आनंद मोहन अपने बेटे चेतन आनंद को विधायक बनाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। आनंद मोहन अपनी पूरी राजनीतिक ताकत और प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि चेतन की जीत सुनिश्चित हो सके।​मगर, सदर सीट की तरह ही नबीनगर में भी चेतन आनंद को ‘बाहरी’ होने के तानों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय दावेदारों को दरकिनार कर चेतन को टिकट मिलने से एक बड़ा वर्ग नाराज बताया जा रहा है।


​NDA के लिए ‘अपनों’ ने ही बढ़ाई मुश्किलें
​इन दोनों हाई-प्रोफाइल सीटों पर एनडीए के लिए सबसे बड़ा संकट यह है कि उनकी लड़ाई सिर्फ विपक्ष से नहीं, बल्कि ‘अपनों’ से भी है।
​सनसनीखेज मोड़: सूत्रों के मुताबिक, दोनों ही सीटों पर एनडीए प्रत्याशियों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द उनके स्वजातीय वोटों का बिखराव बन गया है। जिन जातीय समीकरणों के बल पर ये दिग्गज अपने बेटों की नैया पार लगाना चाहते थे, उन्हीं समीकरणों में सेंधमारी हो गई है। ‘बाहरी’ होने के टैग ने उनके अपने ही वोट बैंक को नाराज कर दिया है, जो अब बंटता हुआ दिख रहा है।​यह बिखराव सीधे तौर पर एनडीए के स्थापित ‘वोट-मैनेजमेंट’ को चुनौती दे रहा है और इसने दोनों पिताओं की नींद उड़ा दी है।


क्या रंग लाएगी पिताओं की मेहनत?
​अब देखना दिलचस्प होगा कि ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ की इस कांटे की टक्कर में दो पिताओं की जी-तोड़ मेहनत क्या रंग लाती है। क्या गोपाल नारायण सिंह और आनंद मोहन का राजनीतिक रसूख और उनकी ‘गोटी सेटिंग’ स्थानीय विरोध पर भारी पड़ेगी? या फिर ‘बाहरी’ होने का दंश और स्वजातीय वोटों का बिखराव, इन दिग्गजों के अपने बेटों को विधायक बनाने के सपनों का पंख कुतर देगा?​फिलहाल, इन दो सीटों पर एनडीए की प्रतिष्ठा बुरी तरह फंसी हुई है और अंतिम दौर का यह मुकाबला बेहद तनावपूर्ण हो गया है।

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