Aurangabad: प्रमोदमय रफीगंज विधानसभा सीट पर कहां टिकेंगे राजद के गुलाम
Magadh Express: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के अंतिम च रण की दहलीज पर खड़ी रफीगंज (सीट संख्या 224) विधानसभा सीट पर राजनीतिक समीकरण एक बार फिर जातीय ध्रुवीकरण, स्थानीय मुद्दों और गठबंधनों की जटिल जाल में उलझ गए हैं। यहां जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के दिग्गज नेता प्रमोद कुमार सिंह का वर्चस्व से ‘प्रमोदमय’ माहौल बना हुआ है, जो 2020 के चुनाव में भी अपनी मजबूत पकड़ के दम पर 53,000 से अधिक वोटों के साथ निर्दलीय उम्मीदवार के रूप दूसरे स्थान पर थे वहीं राजद से मो नेहालुद्दीन 63000 वोट लाकर जीत दर्ज की थी ।
लेकिन विपक्षी महागठबंधन की ओर से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के उम्मीदवार डॉ. प्रोफेसर गुलाम शाहिद की एंट्री ने इस सीट को एक रोचक जंग का मैदान बना दिया है। सवाल यह है कि क्या गुलाम शाहिद, जो स्थानीय स्तर पर चेयरमैन और प्रोफेसर के रूप में जाना-पहचाना चेहरा हैं, इस ‘प्रमोदमय’ किले को भेद पाएंगे? या फिर एनडीए का जातीय समर्थन और विकास का नैरेटिव उन्हें फिर से सत्ता की कुर्सी पर बिठा देगा?
रफीगंज का राजनीतिक इतिहास: जेडीयू का गढ़, राजद की चुनौती
रफीगंज विधानसभा सीट औरंगाबाद जिले के हृदय स्थल पर बसी है, जो मगध क्षेत्र की सांस्कृतिक और आर्थिक धुरी मानी जाती है। 2020 के विधानसभा चुनाव में यहां यहां वर्तमान जेडीयू के प्रमोद कुमार सिंह ने राजद के मो नेहालुद्दीन के बीच टक्कर थी जहां प्रमोद कुमार सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ते हुए बेहतरीन प्रदर्शन किया था और को 53000 से अधिक वोट के साथ ये बताया था कि रफीगंज में प्रमोद कुमार सिंह का जलवा और जनसमर्थन दोनों ही है जिसके बाद जदयू ने इन पर भरोसा जताकर इस बार उम्मीदवार बनाया है ।
कुल 2.5 लाख से अधिक मतदाताओं वाली इस सीट पर मतदान प्रतिशत 60% के आसपास रहा, लेकिन एनडीए का वोट शेयर 55% से ऊपर था। प्रमोद सिंह, जो लोजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुके हैं, राजपूत जाती से होने के बाद भी यहां कुशवाहा (ओबीसी) समुदाय के प्रमुख चेहरे के रूप में स्थापित हैं। उनकी छवि एक ‘विकास पुरुष’ की है, जो सड़क, बिजली और सिंचाई परियोजनाओं के जरिए ग्रामीण इलाकों में अपनी पैठ मजबूत कर चुके हैं।
दूसरी ओर, राजद का इतिहास इस सीट पर उतना मजबूत नहीं रहा। 2015 में महागठबंधन के दौर में भी यहां एनडीए ने कब्जा जमाया था। लेकिन 2025 के चुनाव में डॉ. गुलाम शाहिद का नामांकन (20 अक्टूबर 2025 को दाखिल) ने राजद को नई उम्मीद जगाई है। शाहिद, जो रफीगंज नगर पंचायत के पूर्व चेयरमैन और वर्तमान चेयरपर्सन मीरीख दरखशां के प्रतिनिधि हैं, शिक्षा जगत से जुड़े होने के कारण युवाओं और महिलाओं में लोकप्रिय हैं। उन्होंने नामांकन के दौरान कहा, “मेरी पहचान मेरे काम से है। रफीगंज को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाना मेरा संकल्प है।” उनके अभियान में जनसंपर्क का जोर है, जैसे हाल ही में बहादुरपुर गांव में आयोजित सभा जहां ग्रामीणों ने उनका खुला समर्थन किया।
जातीय समीकरण: मुस्लिम-यादव का गठजोड़ बनाम कुशवाहा-ईबीसी का दबदबा
बिहार की राजनीति में जाति ही राजा है, और रफीगंज इसका अपवाद नहीं। यहां कुल मतदाताओं में मुस्लिम वोटर करीब 25-30% हैं, यादव 15-20%, कुशवाहा (कोइरी) 20%, और अन्य ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) 25% के आसपास। अनुसूचित जाति (एससी) और सामान्य वर्ग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राजद का मजबूत पक्ष: डॉ. गुलाम शाहिद मुस्लिम समुदाय से हैं, जो महागठबंधन के कोर वोट बैंक का हिस्सा हैं। राजद का यादव समर्थन (लालू-तेजस्वी फैक्टर) यहां MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को मजबूत कर सकता है। इसके अलावा, कांग्रेस और वामपंथी दलों का साथ मिलने से ईबीसी और दलित वोटों का कुछ हिस्सा भी शिफ्ट हो सकता है। शाहिद का स्थानीय चेहरा होना—चेयरमैन के रूप में नगर विकास कार्यों का श्रेय—महिलाओं और युवाओं को आकर्षित कर रहा है। हाल के सोशल मीडिया कैंपेन में #VoteForGulamShahid ट्रेंड कर रहा है, जहां विकास और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर फोकस है।
एनडीए की मजबूती: प्रमोद कुमार सिंह का कुशवाहा समुदाय यहां निर्णायक है, जो एनडीए का मजबूत आधार है। जेडीयू-बीजेपी गठबंधन के जरिए ईबीसी और ऊपरी जातियों (भूमिहार, राजपूत) का समर्थन सुनिश्चित है। नीतीश कुमार का ‘सुशासन’ मॉडल—जैसे हर घर नल का जल और सड़क निर्माण—ग्रामीण मतदाताओं को लुभा रहा है। बीजेपी का हिंदुत्व नैरेटिव भी मुस्लिम वोटों को ध्रुवीकृत करने में मददगार साबित हो सकता है। 2020 के आंकड़ों से साफ है कि एनडीए का वोट ट्रांसफर यहां 90% से ऊपर रहता है।
हालांकि, औरंगाबाद जिले में टिकट वितरण का बवाल राजद के लिए दोहरी तलवार साबित हो रहा है। जिले के तीन विधायकों का टिकट कटना पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा कर चुका है। इससे राजद का संगठनात्मक कमजोर पड़ना लाजमी है, जबकि एनडीए का एकजुट दिखना शाहिद के लिए चुनौती।
स्थानीय मुद्दे: विकास vs जंगलराज का नैरेटिव
रफीगंज कृषि-प्रधान क्षेत्र है, जहां, बेरोजगारी और पलायन प्रमुख मुद्दे हैं। शाहिद का फोकस शिक्षा और स्वास्थ्य पर है—वह प्रोफेसर होने के नाते सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने का वादा कर रहे हैं। वहीं, प्रमोद सिंह सड़क और बिजली परियोजनाओं और नीतीश कुमार के द्वारा किए गए महिला उत्थान कार्यों का श्रेय ले रहे हैं, साथ ही राजद पर ‘जंगलराज’ लौटाने का आरोप लगा रहे हैं। तेजस्वी यादव का रोड शो यहां पहुंचा तो युवा मतदाताओं में उत्साह दिखा, लेकिन एनडीए की ओर से अमित शाह का बयान—”यह चुनाव जंगलराज से बचाने का है”—मतदाताओं को याद दिला रहा है।
सोशल मीडिया पर बहस गर्म है। एक ओर जहां राजद समर्थक शाहिद को ‘स्थानीय हीरो’ बता रहे हैं, वहीं एनडीए कार्यकर्ता प्रमोद सिंह को ‘विकास का प्रतीक’। X (पूर्व ट्विटर) पर #RafiganjElection2025 ट्रेंड कर रहा है, जहां जातीय टिप्पणियां भी सामने आ रही हैं।
संभावित परिणाम: प्रमोद की बढ़त, लेकिन गुलाम की सरप्राइज संभावना
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 11 नवंबर को होने वाले मतदान में कुल 2.6 लाख मतदाता भाग लेंगे। सर्वे (जैसे CVoter) एनडीए को 52-55% वोट शेयर दे रहे हैं, जबकि महागठबंधन को 42-45%। लेकिन मुस्लिम-यादव एकजुटता और युवा वोट शिफ्ट से शाहिद 10-15% अंतर से चुनौती दे सकते हैं। यदि राजद का वोट ट्रांसफर 80% से ऊपर रहा, तो अपसेट संभव। अन्यथा, प्रमोद सिंह का ‘प्रमोदमय’ दौर जारी रहेगा।
रफीगंज की यह जंग बिहार के बड़े समीकरण को भी प्रभावित करेगी—क्या महागठबंधन मगध क्षेत्र में पलटवार कर पाएगा? या एनडीए का कुशवाहा-ईबीसी गठजोड़ अटल रहेगा? 14 नवंबर के रुझानों तक इंतजार ही समाधान है। फिलहाल, गुलाम शाहिद की कोशिशें रफीगंज को ‘प्रमोदमय’ से ‘गुलाममय’ बनाने की हैं, लेकिन रास्ता कठिन।