नबीनगर विधानसभा: निर्दलीयों की एंट्री से बढ़ी दिग्गजों की मुश्किलें, मुकाबला हुआ और दिलचस्प

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संदीप कुमार

औरंगाबाद जिले की चर्चित नबीनगर विधानसभा सीट पर इस बार का चुनावी रण पहले से कहीं ज्यादा दिलचस्प हो गया है।


मुख्य मुकाबला भले ही जदयू के चेतन आनंद, राजद के आमोद चंद्रवंशी और जन सुराज पार्टी की अर्चना चंद्र यादव के बीच नजर आ रहा हो, लेकिन निर्दलीय लव सिंह और मृत्युंजय यादव की एंट्री ने समीकरण पूरी तरह उलट-पुलट कर दिए हैं।


इसके अलावा बसपा प्रत्याशी डॉ. बिनोद कुमार भी मैदान में हैं, जो धीरे-धीरे अपने जनसेवा वाले छवि से वोटरों को प्रभावित कर रहे हैं।

लव सिंह का विरोध – चेतन आनंद के लिए सबसे बड़ी चुनौती

नबीनगर के पूर्व प्रखंड प्रमुख और जदयू के पूर्व प्रवक्ता लव सिंह अब बगावत की राह पर हैं।


वे इस बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं और खुलकर चेतन आनंद को “बाहरी प्रत्याशी” करार दे रहे हैं।


उनका नारा है – “नबीनगर का बेटा ही विधायक बनेगा।”
लव सिंह का यह स्थानीयता वाला कार्ड एनडीए गठबंधन, खासकर जदयू उम्मीदवार चेतन आनंद के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है।
स्थानीय स्तर पर उनकी पकड़ और संगठन क्षमता से एनडीए को अंदरूनी नुकसान की आशंका बढ़ गई है।

मृत्युंजय यादव का उभार – राजद के ‘माई समीकरण’ में सेंध

दूसरे निर्दलीय उम्मीदवार मृत्युंजय यादव ने भी इस सीट पर समीकरणों में खलबली मचा दी है।


उनकी जातीय पकड़ और क्षेत्रीय पहचान ने राजद प्रत्याशी आमोद चंद्रवंशी की चिंता बढ़ा दी है।


कहा जा रहा है कि यादव और मुस्लिम मतदाताओं पर पारंपरिक पकड़ रखने वाले राजद को मृत्युंजय यादव की एंट्री से सीधा नुकसान हो सकता है।


उनके द्वारा किए गए हालिया शक्ति प्रदर्शन में जुटी भारी भीड़ ने विरोधियों की रातों की नींद उड़ा दी है।

बसपा प्रत्याशी डॉ. बिनोद कुमार – भरोसा जनसेवा पर

बसपा के डॉ. बिनोद कुमार, जो पेशे से चिकित्सक हैं, लंबे समय से क्षेत्र में सामाजिक सेवा में सक्रिय रहे हैं।
वे कहते हैं — “जनता मुझे डॉक्टर के रूप में जानती थी, अब जनसेवक के रूप में पहचान दे रही है।”
गांव-गांव चल रहे उनके संपर्क अभियान से ग्रामीण इलाकों में एक शांत लेकिन ठोस समर्थन आधार बनता दिख रहा है।

जन सुराज की अर्चना चंद्र यादव – महिला और स्थानीयता का दोहरा लाभ

जन सुराज पार्टी की अर्चना चंद्र यादव इस चुनाव में “बदलाव की महिला आवाज” बनकर उभर रही हैं।
बारुण प्रखंड की पूर्व प्रमुख और प्रशांत किशोर की “बिहार बदलाव यात्रा” से निकली यह महिला चेहरा अब स्थानीय मतदाताओं के बीच तेजी से पकड़ बना रही हैं।
उनकी साफ-सुथरी छवि, स्थानीय जुड़ाव और महिला उम्मीदवार होने का फायदा उन्हें नए वोट बैंक में बदल सकता है।

चेतन आनंद का पलटवार – ‘मैं बाहरी नहीं, यहीं का बेटा हूं’

जदयू प्रत्याशी चेतन आनंद, दिग्गज नेता आनंद मोहन सिंह के पुत्र हैं।
वे अपने खिलाफ उठे “बाहरी” के आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं —
“मेरा बचपन यहीं बीता है, मेरा नाता नबीनगर से खून का है। अगर जनता मौका देगी तो मेरा घर भी यहीं होगा।”
चेतन आनंद कहते हैं कि उनका लक्ष्य “विकास और विरासत” दोनों को साथ लेकर चलना है।
वे वादा करते हैं कि जीतने के बाद नबीनगर को अनुमंडल का दर्जा दिलाना उनकी पहली प्राथमिकता होगी।

राजद के आमोद चंद्रवंशी – ‘घर का बेटा और गरीबों की आवाज’

राजद उम्मीदवार आमोद चंद्रवंशी खुद को “घर का बेटा” बताते हुए जनता से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
वे कहते हैं — “मैं सत्ता नहीं, सेवा करने आया हूं। नबीनगर के गरीबों की आवाज बनूंगा और उनका हक दिलाऊंगा।”
उनका प्रचार अभियान गांव-गांव पहुंचकर स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित है।

बहुकोणीय मुकाबला, समीकरण उलझे

कुल मिलाकर, नबीनगर का चुनाव इस बार त्रिकोणीय से बढ़कर बहुकोणीय हो गया है।
जहां चेतन आनंद “विकास और विरासत” के नाम पर वोट मांग रहे हैं,
वहीं अमोध चंद्रवंशी “स्थानीय बेटे” की पहचान पर जोर दे रहे हैं।
अर्चना चंद्र यादव “महिला सशक्तिकरण और बदलाव” की लहर भुनाने में जुटी हैं,
तो लव सिंह और मृत्युंजय यादव दोनों ने अपने-अपने स्थानीय मुद्दों से पूरे समीकरण को उलझा दिया है।

अब सवाल यह है —
क्या नबीनगर इस बार विरासत चुनेगा, स्थानीयता को तवज्जो देगा या बदलाव की नई राह पर चलेगा?
2025 का यह चुनाव तय करेगा कि नबीनगर की जनता किसे अपना असली “बेटा” और प्रतिनिधि मानती है।

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