महागठबंधन में सीएम वार!
बिहार विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है, लेकिन विपक्षी खेमे महागठबंधन के भीतर मुख्यमंत्री पद का चेहरा ही सबसे बड़ा विवाद बन चुका है। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के रुख़ ने इस मसले को और पेचीदा बना दिया है।
तेजस्वी का सीधा वार
एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में तेजस्वी यादव ने भाजपा पर हमला बोला लेकिन असली निशाना कांग्रेस को बना डाला। उन्होंने कहा—
“क्या हम भारतीय जनता पार्टी हैं कि हमारे पास कोई चेहरा नहीं है? महागठबंधन बिना मुख्यमंत्री पद का चेहरा पेश किए चुनाव नहीं लड़ेगा।”
तेजस्वी का यह बयान कांग्रेस के लिए सियासी चुनौती है। यह साफ़ संदेश है कि राजद चुनाव में ‘चेहरे’ के बिना समझौता नहीं करेगी।
कांग्रेस की खामोशी
तेजस्वी जहां खुद को मुख्यमंत्री की दौड़ में स्वाभाविक दावेदार मान रहे हैं, वहीं कांग्रेस का रुख़ बिल्कुल उलटा है। राहुल गांधी ने साफ़ कहा था—
“इंडिया ब्लॉक के सहयोगी आपसी सम्मान के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे, नतीजे अच्छे होंगे।”
लेकिन राहुल ने तेजस्वी का नाम आगे बढ़ाने से परहेज किया। यही खामोशी महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो रही है।
सियासी मायने
तेजस्वी का बयान सिर्फ़ हुंकार नहीं, बल्कि एक सियासी दबाव रणनीति भी है। दरअसल, आरजेडी बिहार में महागठबंधन की सबसे बड़ी ताकत है। पिछली बार भी आरजेडी को कांग्रेस से कहीं ज़्यादा सीटें मिली थीं। ऐसे में तेजस्वी यह जताना चाहते हैं कि ‘कुर्सी की चाबी’ उनके पास है।
दूसरी ओर, कांग्रेस नहीं चाहती कि चुनाव से पहले एकतरफा तेजस्वी का नाम तय हो जाए। पार्टी का मानना है कि इससे सीट बंटवारे में उसका पलड़ा कमजोर पड़ जाएगा।
चुनावी असर
महागठबंधन के भीतर मुख्यमंत्री चेहरे की जंग अब खुलकर सामने आ चुकी है।
तेजस्वी चाहते हैं कि जनता के बीच वे ही चेहरा बनकर जाएं।
कांग्रेस अभी ‘समूहगत नेतृत्व’ की थ्योरी से चिपकी हुई है।
इस खींचतान से सबसे बड़ा फायदा एनडीए को मिल सकता है, क्योंकि महागठबंधन की फूट जनता के सामने एक्सपोज़ हो रही है।

महागठबंधन एकता का ढोल पीट रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री के चेहरे पर बिखराव साफ़ दिख रहा है। तेजस्वी के तीखे तेवर और राहुल की खामोशी मिलकर एक ही कहानी कह रहे हैं—
बिहार की चुनावी राजनीति में अभी असली जंग महागठबंधन के भीतर ही लड़ी जा रही है।