Aurangabad :(देव) जिन्हें करना था योजनाओं की निगरानी ,वो बन बैठे ठेकेदार,ये है देव नगर पंचायत की कहानी,देव का विकास मॉडल

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Magadh Express:औरंगाबाद जिले के ऐतिहासिक सूर्य नगरी देव का हाल यथावत स्थिति में बना हुआ है ।यहां नगर पंचायत के बाबुओं की चांदी कट रही है ।विकास को लेकर बड़े बड़े किए गए दावे सिर्फ घोषणाओं और कागजों में ही सिमटी हुई है ,जबकि धरातल पर स्थिति यथावत है ।देव स्थित पवित्र सूर्य कुंड तालाब और रुद्र कुंड तालाब के परिसर स्थित नगर पंचायत भवन में यहां के विकास के लिए चुने गए जन प्रतिनिधि भले ही एयर कंडीशन में अपने कार्य कर रहे हो ,लेकिन इसी भवन की आसपास की स्थिति नारकीय है ।

देव मुख्य बाजार में देव और मदनपुर क्षेत्र के सैकड़ों गांवों से महिला पुरुष यहां नित्य पहुंचते है ।यही नहि औरंगाबाद जिले और जिले के बाहर से आने वाले सैकड़ों लोग प्रतिदिन देव आते है और पवित्र सूर्य मंदिर तथा सूर्यकुण्ड तालाब दर्शन को जरूर पहुंचते है ।सूर्य मंदिर की साफ सफाई तो न्यास समिति के अंतर्गत है ,जबकि पूरे देव की साफ सफाई की व्यवस्था नगर पंचायत के जिम्मे है । देव में हजारों लोगों का आना जाना लगा है लेकिन देव बाजार में महिला पुरुषों के लिए किसी तरह की शौचालय और बाथरूम की व्यवस्था नहीं ही ,जो विकास के नए मॉडल दिखाती है । विकास के नए मॉडल में नगर पंचायत भवन से नजदीक तालाब परिसर में खुले में बाथरूम जाने की व्यवस्था की गई है जो विकास के अत्याधुनिक मॉडल कहा जा रहा है ।जबकि महिलाओं के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं है ।सोचिए ऐसे में महिला श्रद्धालु, दर्शनार्थी की स्थिति क्या होगी , बाथरूम शौच के लिए तो उन्हें सुरक्षित स्थान नहीं मिले तो खुले में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है ।

कहने को तो नगर पंचायत भवन है लेकिन इनका कोई अपना परिसर नहीं है ,जिसके कारण नगर पंचायत भवन के पीछे रुद्र कुंड तालाब परिसर में कचड़ा उठाने वाली टूटी फूटी कचड़ा उठाने वाली साइकिलों की एक प्रदर्शनी तालाब परिसर के विकास मॉडल में चार चांद लगा रही है ।
पिछले वर्षों से यहां विकास मॉडल के तहत बड़े बड़े भवन बनाए जा रहे है ,तब से यहां खुले में शौच और बाथरूम से सूर्यकुण्ड तालाब परिसर की स्थिति ग्राम पंचायत से भी खराब स्थिति में है ,जो यहां आने वाले लोगों की जुबानी से समझा जा सकता है ।खुली नालियां , तालाब परिसर में लगने वाली दुकानों से फैल रही गंदगी और हल्की हवा से गंदगी का सूर्यकुण्ड तालाब और रुद्र कुंड तालाब में जाना यहां के नियति बन चुकी है । नगर पंचायत की ओर से दलील दी जाती है कि तालाब परिसर में दुकानें नगर पंचायत नहीं बल्कि जिला परिषद की ओर से लगाया जाता है और इसका राजस्व भी जिला परिषद ही लेता है ।


वहीं देव के थाना मोड़ से लेकर दीवान बाग ,हाजीनगर और मल्लाह टोली के बीच खेतों में सैकड़ों मकाने बन गई है लेकिन बेहतर नालियों या नाला के प्रबंध नहीं होने के कारण जल जमाव की स्थिति साल में चार महीने भयंकर रहती है जो अभी बनी हुई है । देव के आनंदी बाग स्थित देवी मंदिर के पास खेतों की पानी मुख्य सड़क पर बह रही है ,जिससे पैदल आने जाने वाले लोगों को गंदी नालियों के पानी से गुजरना पड़ रहा है । देव के दतू बिगहा में जल जमाव से लोगों की परेशानी बढ़ी हुई है ।देव गोदाम स्थित मुख्य सड़क पर जल जमाव से बड़े बड़े गड्ढे बने हुए है और छोटे वाहनों और बड़े वाहनों को अत्यधिक परेशानी हो रही है तो सोचिए पैदल चलने वालो की स्थिति क्या होगी । नगर पंचायत में मुख्य सड़क को छोड़कर आसपास की सड़कों को नियमित सफाई नहीं होती ,बरसात में मच्छरों के प्रकोप से बचने के साथ साथ कभी भी ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव नहीं किया जाता है ,जो देव का विकास मॉडल है ।


विकास मॉडल के तहत मुख्य रूप से वर्ष में यहां दो बार ही विकास मॉडल दिखाया जाता है ,पहला चैती छठ पूजा, दूसरा कार्तिक छठ पूजा । छठ पूजा के दौरान पूरे जिले का विकास मॉडल देव में उतर जाता है , ताबड़तोड़ फेवर ब्लॉक लगाने का कार्य , सभी नालियों ,गलियों की सफाई , सड़कों पर गन्दी जगहों पर ब्लीचिंग का छिड़काव ,पेयजल की व्यवस्था ,चापकाल की मरम्मती तरह चापकाल परिसर की साफ सफाई ,प्रकाश की व्यवस्था तथा खराब पड़े लाइटों की मेंटेनेंस की व्यवस्था सिर्फ छठ पूजा के दौरान यहां आने वाले श्रद्धालुओं को दिखाई देती है ताकि यहां की व्यवस्थाओं का गुणगान बाहर में होते रहे ,जबकि यहां के लोगों को बाकी दिनों में कुव्यवस्था झेलना आदत बन गई है ।

नगर पंचायत के गठन के साथ ही जीते गए उम्मीदवार जिन्हें देव का विकास का जिम्मा सौंपा गया ,दरअसल उन्हें जनता ने विकास के साथ साथ सरकार से मिलने वाली योजनाओं की क्रियान्वयन के साथ साथ निगरानी करने की जिम्मेदारी दी गई थी ,लेकिन हुआ उल्टा , जिन्हें निगरानी की जिम्मेदारी दी गई थी वो ठेकेदार बन बैठे और कमीशन के खेल ने उन्हें मालामाल कर दिया लेकिन जनता बेचारी समस्याओं से जूझ रही है ।ग्राम पंचायत की तरह यहां के प्रतिनिधियों को छठ मेला का इंतजार रहता है ताकि जिला से विकास और व्यवस्था के नाम पर खूब पैसा आए और नए मॉडल के नाम पर सरकार की राशि का बंदरबांट हो । देव में सरकार या जिला से मिलने वाली योजनाओं को टेंडर प्रक्रिया के तहत नहीं लाया जाएगा तबतक गुणवतापूर्ण विकास की बात कहना बेइमानी है ।

इस मामले पर स्थानीय समाजसेवी आलोक कुमार सिंह ने कहा है कि किसी भी सरकारी या निजी योजना की टेंडर प्रक्रिया (Tender process), जिसे हिंदी में निविदा प्रक्रिया भी कहते हैं, एक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी तरीका है जिससे किसी काम को करने के लिए सबसे योग्य और सबसे अच्छी बोली लगाने वाली कंपनी या व्यक्ति का चयन किया जाता है। इस प्रक्रिया से सरकार या संस्था को कई लाभ मिलते हैं, जैसे:
निष्पक्षता और पारदर्शिता।यह प्रक्रिया सभी बोली लगाने वालों को समान अवसर देती है ।टेंडर के नियम और शर्तें सभी के लिए एक समान होती हैं, जिससे किसी भी तरह की पक्षपात की संभावना खत्म हो जाती है।सार्वजनिक रूप से टेंडर जारी होने और फिर बोली खुलने से पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहती है।लेकिन देव नगर पंचायत में निगरानी करने वाला नगर प्रशासन के अधिकारी और जन प्रतिनिधि नहीं चाहते कि यहां कोई टेंडर प्रक्रिया हो , यदि टेंडर प्रक्रिया से कार्य शुरू किया गया तो इसका सीधा असर इनकी जेबों पर पड़ेगा ।टेंडर प्रक्रिया से कई फायदे है ,जैसे


लागत में कमी और गुणवत्ता में सुधार:-जब कई कंपनियाँ या व्यक्ति एक ही काम के लिए बोली लगाती हैं, तो उनमें प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। इससे सरकार को सबसे कम कीमत पर सबसे अच्छी सेवा मिल पाती है।कंपनियाँ अपना टेंडर इस तरह से तैयार करती हैं कि वे न सिर्फ सबसे अच्छी कीमत दें, बल्कि अपने काम की गुणवत्ता भी साबित कर सकें।

दक्षता और विश्वसनीयता:-टेंडर प्रक्रिया में बोली लगाने वाली कंपनियों को अपने पिछले काम का अनुभव और वित्तीय स्थिति दिखानी होती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि काम उसी को मिले जो उसे समय पर और सही तरीके से पूरा कर सके।यह प्रक्रिया काम में लगने वाले समय और लागत का अनुमान लगाने में मदद करती है, जिससे योजना का क्रियान्वयन अधिक कुशल हो जाता है।
भ्रष्टाचार पर नियंत्रण :-यह एक औपचारिक और लिखित प्रक्रिया है, जिससे व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर काम देने की संभावना कम हो जाती है।प्रक्रिया के सभी चरण रिकॉर्ड किए जाते हैं, जिससे किसी भी अनियमितता की जाँच आसानी से की जा सकती है।

आलोक सिंह ने आगे कहा कि देव नगर पंचायत में जिन्हें निगरानी का जिम्मा दिया गया था वो अब ठेकेदार बन बैठे है ऐसे में पूरी पारदर्शिता के साथ कार्य करना संभव नहीं है । वहीं समाजसेवी दीपक कुमार सिंह ने कहा है कि टेंडर प्रक्रिया से योजनाओं का क्रियान्वयन अधिक पारदर्शी, लागत-प्रभावी और कुशल हो जाता है। यह सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक धन का उपयोग सही तरीके से हो और जनता को इसका पूरा लाभ मिले।देव में पिछले मेला में कराए गए कार्यों को ही देख लिया जाय , कि उसकी अभी स्थिति क्या है दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जायेगा ।

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