औरंगाबाद सदर विधानसभा सीट : यहाँ टिकट के लिए दौड़ नहीं, सियासी ‘कुश्ती’ हो रही है!

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​बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की डुगडुगी अभी बजी भी नहीं, लेकिन औरंगाबाद सदर विधानसभा सीट पर सियासी पहलवानों ने लंगोट कस ली है। यहाँ का नजारा किसी चुनावी रणनीति की बैठक का नहीं, बल्कि एक ऐसे दंगल का लग रहा है, जहाँ एक अनार (टिकट) है और बीमार (उम्मीदवार) इतने कि गिनती भूल जाए। जो सीट कभी एनडीए का अभेद्य किला मानी जाती थी, आज वहीं उम्मीदवारों की ऐसी ‘सेल’ लगी है कि मानो टिकट नहीं, मेले का टोकन बंट रहा हो।

​हैट्रिक हार का डर और ‘मैं ही क्यों नहीं’ का शोर



​2015 और 2020 में लगातार दो बार हार का स्वाद चखने के बाद एनडीए के लिए 2025 का चुनाव नाक का सवाल है। पार्टी ‘जीत’ की संजीवनी खोज रही है, लेकिन यहाँ तो हर दावेदार खुद को ‘हनुमान’ समझ बैठा है। पूर्व मंत्री से लेकर पूर्व सांसद तक, और जमीनी कार्यकर्ता से लेकर हाल ही में भाजपा का दामन थामने वाले नेताओं तक, हर कोई अपना बायोडाटा लेकर दिल्ली और पटना की ओर टकटकी लगाए बैठा है।

​दावेदारों की फेहरिस्त देखिए:


पूर्व मंत्री रामाधार सिंह का अनुभव है, तो पूर्व सांसद सुशील कुमार सिंह का संसदीय कद। भाजपा के कद्दावर नेता गोपाल शरण सिंह हैं, तो “जमीनी और जुझारू” अनिल कुमार सिंह भी ताल ठोक रहे हैं। इस भीड़ में पूर्व विधान पार्षद राजन सिंह, नए-नवेले भाजपाई प्रवीण सिंह, युवा नेता सतीश कुमार सिंह और ‘हम’ से आए हरेंद्र कुमार सिंह भी अपनी-अपनी दावेदारी का झंडा बुलंद किए हुए हैं। अब इस दंगल में मुकेश कुमार सिंह जैसे नए पहलवानों के कूदने से अखाड़ा और भी दिलचस्प हो गया है।

​एक सीट, अनेक सपने: कौन होगा इंजन, कौन बनेगा डिब्बा?



​हालात ऐसे हैं कि औरंगाबाद में एनडीए की “आकांक्षा एक्सप्रेस” चल पड़ी है, लेकिन इस ट्रेन में इंजन कौन है और डिब्बे कौन, यह तय करना मुश्किल हो गया है।

हर कोई खुद को इंजन बताकर टिकट की सीटी बजाना चाहता है। यह टिकट की दौड़ कम और राजनीतिक ‘महाभारत’ ज्यादा लग रही है, जहाँ अपने ही अपनों के खिलाफ चक्रव्यूह रच रहे हैं।


​इस सियासी कुश्ती का सबसे मजेदार पहलू यह है कि पहलवान अभी विपक्षी उम्मीदवार से नहीं, बल्कि आपस में ही दो-दो हाथ कर रहे हैं। कोई अपनी जाति का दम भर रहा है, तो कोई संगठन में अपने योगदान का ढिंढोरा पीट रहा है। जनता बेचारी दर्शक दीर्घा में बैठी यह तमाशा देख रही है और सोच रही है कि जो लोग टिकट के लिए इतनी जोर-आजमाइश कर रहे हैं, वे चुनाव जीतने के बाद उसकी सुध लेंगे भी या नहीं?


​फिलहाल, औरंगाबाद सदर में एनडीए की नाव मझधार में है और खेवनहार अनेक। पार्टी आलाकमान के लिए यह तय करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा कि वह किस पहलवान पर दांव लगाए जो न सिर्फ यह ‘अखाड़ा’ जीते, बल्कि चुनावी वैतरणी भी पार कराए। तब तक के लिए एक बात तो साफ है – “औरंगाबाद सदर में अब टिकट की दौड़ नहीं, बल्कि टिकट की कुश्ती हो रही है।”

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