Aurangabad :₹24 लाख का ‘सेटलमेंट’, अब IMA का ‘क्लीन चिट’! सिविल सर्जन के अस्पताल में मौत पर डॉक्टरों की दलील- “अस्पताल में नहीं तो क्या मॉल में होगी मौत?”

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Magadh Express :- जान की कीमत ₹24 लाख 20 हजार… और अब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की तरफ से “क्लीन चिट” का मरहम! औरंगाबाद के सिविल सर्जन डॉ. लालसा सिन्हा के निजी अस्पताल में जच्चा-बच्चा की मौत का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि IMA ने एक आपात प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर न केवल सिविल सर्जन को बेदाग बताया, बल्कि मीडिया को “रहम” करने और एकपक्षीय खबर न छापने की नसीहत भी दे डाली। यह प्रेस कॉन्फ्रेंस सवालों के जवाब देने के बजाय, पूरे स्वास्थ्य महकमे की जवाबदेही पर और भी गंभीर सवाल खड़े कर गई।


​IMA ने किया बचाव, दिए बेतुके तर्क
​शहर के तमाम अखबारों और डिजिटल मीडिया में खबर प्रमुखता से छपने के बाद आनन-फानन में बुलाई गई इस प्रेस वार्ता में IMA के प्रवक्ता डॉ. वी. किशोर ने डॉ. लालसा सिन्हा का बचाव करते हुए कहा, “यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी, इसमें मैडम की कोई गलती नहीं है। उन्होंने मरीज को बचाने की हर संभव कोशिश की।” लेकिन हद तो तब हो गई जब मौत को सामान्य बताते हुए यह तर्क दिया गया कि ऐसी घटना कभी भी और कहीं भी हो सकती है। एक्सीडेंट रोड पर ही होता है ।

​साईं हॉस्पिटल के संचालक और IMA के सदस्य डॉ. विकास कुमार ने तो हंगामे और तोड़-फोड़ के डर को ₹24 लाख के समझौते की वजह बता दिया। उन्होंने कहा, “समझौता हमारी मजबूरी थी, लोग तोड़-फोड़ कर रहे थे।” IMA ने यहां तक कह दिया, “हम किसी उच्च गुणवत्ता वाली सोसाइटी में नहीं रहते। मौत अस्पताल में ही होगी, मॉल में थोड़ी न होगी।” डॉक्टरों के इस रवैये ने मानो यह साबित कर दिया कि उनके लिए एक जान की कीमत हंगामे और तोड़-फोड़ से ज्यादा कुछ नहीं।

​जब पत्रकारों ने आईना दिखाया

​IMA ने अपनी नाकामियों का ठीकरा मीडिया पर फोड़ते हुए आरोप लगाया कि पत्रकारों ने एकतरफा खबर छापी और उनका पक्ष नहीं लिया। इस पर मौके पर मौजूद पत्रकारों ने दो टूक जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन और खुद सिविल सर्जन से कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन किसी ने भी अपना पक्ष रखना जरूरी नहीं समझा। पत्रकारों ने कहा, “जब आपके यहां कोई घटना होगी, आप पक्ष देंगे नहीं, तो क्या खबर नहीं छपेगी? यह एक मौत और हंगामे की घटना थी, जिसे छापना हमारी जिम्मेदारी है।”

​सिविल सर्जन और निजी प्रैक्टिस का सवाल

​जब IMA ने यह दलील दी कि सिविल सर्जन को नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस (NPA) नहीं मिलता, इसलिए वह निजी क्लिनिक चला सकती हैं, तो पत्रकार सनोज पाण्डेय ने एक चुभता हुआ सवाल दागा- “सिविल सर्जन 24 घंटे सिविल सर्जन होता है।” यह एक वाक्य पूरे सिस्टम के “हितों के टकराव” की पोल खोल गया, जिस पर IMA के डॉक्टर बगले झांकते नजर आए।

पहले ‘सेटलमेंट’, अब ‘क्लीन चिट’, क्या न्याय का पटाक्षेप हो गया?।

​यह पूरा घटनाक्रम एक खतरनाक पैटर्न की ओर इशारा करता है। पहले एक महिला और उसके अजन्मे बच्चे की मौत होती है। फिर राजनीतिक हस्तक्षेप से लाखों का ‘समझौता’ कर मामले को कानूनी कार्रवाई तक पहुंचने से पहले ही रफा-दफा कर दिया जाता है। और अब, जब मीडिया के दबाव में सिस्टम पर सवाल उठे, तो डॉक्टरों की सबसे बड़ी संस्था (IMA) खुद आरोपी डॉक्टर के बचाव में ढाल बनकर खड़ी हो गई है।

​पहले मृतक के परिजनों द्वारा समझौता और अब IMA द्वारा “दुर्भाग्यपूर्ण घटना” बताकर दी गई क्लीन चिट ने औरंगाबाद के स्वास्थ्य महकमे पर उठ रहे सवालों का पटाक्षेप करने की कोशिश तो की है, लेकिन कई अनसुलझे सवाल छोड़ दिए हैं।क्या एक सरकारी पद पर बैठा अधिकारी अपने निजी क्लिनिक में हुई मौत की जवाबदेही से यूं ही बच सकता है?क्या पैसों से किसी की जान का सौदा तय होगा और डॉक्टरों की संस्था उसे “मजबूरी” बताकर जायज ठहरा देगी?

Authors

  • Dhiraj Kumar Pandey

    Editor In Chief

  • Kumar Ashwani

    Founder/CEO of Magadh Express, dedicated to amplifying public concerns and advancing transparent journalism with over a decade of experience in digital media, contributed to prominent platforms such as Dailyhunt and NewsDog. A certified Cyber Security Expert and Law Scholar, brings a rare combination of technical, legal, and journalistic insight to regional media. which reflects a strong commitment to credible, ethical, and impactful public interest reporting.

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