जान के सौदागर! औरंगाबाद सिविल सर्जन के अस्पताल में जच्चा-बच्चा की मौत, MLA की ‘पंचायत’ में ₹24 लाख से बंद की गई ज़ुबान
औरंगाबाद, बिहार। यह खबर औरंगाबाद के स्वास्थ्य महकमे के उस सड़े हुए ‘सिस्टम’ की कहानी बयां करती है, जहां सत्ता, सियासत और पैसे के दम पर मौत को भी रफा-दफा कर दिया जाता है। जिले के सबसे बड़े स्वास्थ्य अधिकारी, सिविल सर्जन (CS) के निजी साईं हॉस्पिटल में 15 साल बाद मां बनने का सपना देख रही एक महिला और उसके नवजात शिशु की दर्दनाक मौत हो गई। मौत के बाद जब परिजनों ने लापरवाही का आरोप लगाकर न्याय की गुहार लगाई, तो कानून के बजाय सियासत ने मोर्चा संभाला। नतीजा? एक पुलिस केस, एक FIR, और एक निष्पक्ष जांच के बजाय, माननीय विधायक की मध्यस्थता में ₹24 लाख 20 हजार का एक ‘समझौता’ हुआ, जिसने कई गंभीर सवालों को जन्म दे दिया है।
15 साल का इंतजार, 9 महीने का भरोसा और चंद घंटों में मातम
माली थाना क्षेत्र के शाहपुर गांव निवासी विनोद यादव और उनकी 32 वर्षीय पत्नी पूनम देवी की जिंदगी में 15 साल के लंबे इंतजार के बाद खुशी आने वाली थी। पूनम गर्भवती थीं और पिछले नौ महीनों से उनका इलाज औरंगाबाद के साईं हॉस्पिटल में चल रहा था, जिसके मालिक कोई और नहीं बल्कि जिले के सिविल सर्जन हैं। रविवार को प्रसव पीड़ा होने पर पूनम को इसी भरोसे के साथ भर्ती कराया गया कि वे यहां से अपने बच्चे के साथ सकुशल घर लौटेंगी।

परिजनों का आरोप है कि ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों ने घोर लापरवाही बरती। जब पूनम की हालत बिगड़ने लगी तो समय पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। परिवार वाले गुहार लगाते रहे, लेकिन उनकी एक न सुनी गई। अंत में, सिस्टम की लापरवाही ने पूनम और उनके अजन्मे बच्चे, दोनों की जान ले ली। 15 साल का इंतजार और 9 महीने का भरोसा, चंद घंटों में मातम में तब्दील हो गया।
हंगामे के बाद ‘सेटलमेंट’ का सियासी खेल
दोहरी मौत से गुस्साए परिजनों और ग्रामीणों ने अस्पताल में जमकर हंगामा किया और प्रबंधन पर हत्या का आरोप लगाया। मामला पुलिस और प्रशाशन तक पहुंचता और जांच होती , कार्रवाई होती इससे पहले ही सफेदपोश ‘मददगार’ मौके पर पहुंच गए।

इस ‘सेटलमेंट’ के मुख्य सूत्रधार बने नबीनगर के वर्तमान विधायक विजय कुमार सिंह उर्फ डब्लू सिंह। उन्होंने बेशर्मी से अपने फेसबुक पेज पर इसे अपनी उपलब्धि की तरह पोस्ट करते हुए लिखा, “…घटनास्थल पर पहुंचा और परिजनों से मिल कर उचित मुआवजा दिलवाने का काम किया।”

’उचित मुआवजा’ दिलवाने के इस खेल में लोजपा जिलाध्यक्ष चंद्रभूषण सिंह, हम के जिलाध्यक्ष रणधीर सिंह और मृतक महिला के पंचायत के पैक्स अध्यक्ष भी शामिल थे। इन सभी ने मिलकर पीड़ित परिवार पर कानूनी कार्रवाई न करने का दबाव बनाया। घंटों चली बैठक के बाद ‘न्याय’ की कीमत लगाई गई।
सौदा तय हुआ- ₹24,20,000/-
₹1,20,000/- नकद
₹23,00,000/- का चेक
यह रकम सिविल सर्जन के साईं हॉस्पिटल द्वारा पीड़ित परिवार को दी गई, और इसके बदले में एक परिवार से उसका कानूनी अधिकार छीन लिया गया।
उठते सवाल, जिनका जवाब कौन देगा?
यह घटना सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का पर्दाफाश है।
विधायक का काम कानून तोड़ना या बनवाना? – विधायक का काम कानून का पालन करवाना है या एक आपराधिक लापरवाही के मामले में पैसे का लेनदेन करवाकर उसे दबाना? क्या विधायक डब्लू सिंह ने अपनी इस भूमिका से न्याय प्रक्रिया को बाधित नहीं किया?

नियामक ही भक्षक: सिविल सर्जन का पद जिले के सभी निजी और सरकारी अस्पतालों का नियामक होता है। जब नियामक का अपना ही अस्पताल मौत का सौदा कर रहा हो, तो जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था का भगवान ही मालिक है। क्या यह हितों के टकराव का स्पष्ट मामला नहीं है?
FIR क्यों नहीं हुई? – जब लापरवाही से मौत का सीधा आरोप था, तो स्थानीय पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेकर FIR दर्ज क्यों नहीं की? क्या नेताओं की मौजूदगी ने कानून के हाथ बांध दिए थे?
क्या पैसे से लौटेंगी दो जानें?– क्या ₹24 लाख उस पति को उसकी पत्नी और उस परिवार को उनका चिराग लौटा सकते हैं, जिसका वे 15 साल से इंतजार कर रहे थे?
इस पूरे मामले पर सिविल सर्जन का वही पुराना रटा-रटाया जवाब है कि मौत दुर्भाग्यपूर्ण थी और परिवार की “मानवीय आधार पर मदद” की गई। लेकिन सवाल यह है कि अगर लापरवाही नहीं थी, तो ₹24 लाख की ‘मदद’ क्यों की गई? यह मामला सरकार और राज्य के स्वास्थ्य विभाग के लिए एक लिटमस टेस्ट है। क्या वह अपने एक दागी अधिकारी, उसे बचाने वाले नेताओं और इस भ्रष्ट सिस्टम पर कोई कार्रवाई करेगा, या फिर औरंगाबाद में ‘न्याय’ का सौदा इसी तरह जारी रहेगा?