बिहार चुनाव 2025: भाजपा का ‘कोर वोट’ हिला तो किसकी होगी चांदी? महागठबंधन नहीं, ‘तीसरे खिलाड़ी’ पलट सकते हैं बाजी!
पटना : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की रणभेरी बजने से पहले ही सियासी गलियारों में एक सवाल सबसे ज़्यादा गूंज रहा है—क्या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का परंपरागत ‘कोर वोटर’ इस बार भी पूरी मजबूती से कमल के साथ खड़ा है? जमीन पर टटोलने पर जो संकेत मिल रहे हैं, वे इस चुनाव को बेहद दिलचस्प बनाते हैं। अगर भाजपा का यह वोट बैंक नाराज़ होकर छिटकता है, तो इसका सीधा फायदा महागठबंधन को मिलेगा, यह सोचना शायद जल्दबाजी होगी। असली चांदी तो उन ‘तीसरे खिलाड़ियों’ की हो सकती है, जो सही मौके का इंतजार कर रहे हैं।

“अब भाजपा को चेतना होगा” – ज़मीन पर नाराज़गी के सुर
भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले इलाकों में भी असंतोष के सुर सुनाई दे रहे हैं। आरा के भोजपुर इलाके में भूमिहार समाज के एक बुजुर्ग किसान, जिनके घर पर आज भी भाजपा का झंडा लहराता है, कहते हैं, “हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी भाजपा को वोट देते आए हैं, लेकिन अब न तो कार्यकर्ताओं की सुनवाई है और न ही पुराने नेताओं की। अगर टिकट बंटवारे में मनमानी हुई तो इस बार हमें नया रास्ता खोजना पड़ेगा।”
यह सिर्फ एक आवाज़ नहीं है, बल्कि उस भावना का प्रतीक है जो भाजपा के कई परंपरागत समर्थकों में पनप रही है।
महागठबंधन पर अविश्वास, तीसरे विकल्प की तलाश
दिलचस्प बात यह है कि भाजपा से असंतुष्ट इन वोटरों का झुकाव सीधे तौर पर महागठबंधन की ओर नहीं दिख रहा है। दरभंगा के एक कायस्थ मतदाता स्पष्ट कहते हैं, “नाराज़गी भाजपा से ज़रूर है, लेकिन RJD का नाम आते ही हमारा समाज सतर्क हो जाता है। उनके शासनकाल को हम भूले नहीं हैं। ऐसे में RJD को वोट देना हमारे लिए बहुत मुश्किल है। अगर कोई तीसरा अच्छा और मजबूत उम्मीदवार मैदान में आया तो हमारा वोट उसी को जाएगा।”
यह मानसिकता इस चुनाव का पूरा गणित बदल सकती है, जहाँ वोटर सत्ता पक्ष से नाराज़ तो है, पर मुख्य विपक्ष को विकल्प नहीं मान रहा।
मैदान में तैयार ‘तीसरे खिलाड़ी’
यही वह खाली जगह है जिसे भरने के लिए बिहार के ‘तीसरे खिलाड़ी’ पूरी तरह तैयार हैं। ये दल और नेता जानते हैं कि भाजपा के कोर वोट में सेंधमारी ही उनकी जीत का सबसे बड़ा फॉर्मूला बन सकती है:
- जेडीयू: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने “EBC-प्लस” एजेंडे और सवर्ण समाज में अपनी पैठ के सहारे इन वोटों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश करेंगे।
- एलजेपी (रामविलास): चिराग पासवान खुद को “युवा बिहारी” और “पीएम मोदी का असली हनुमान” बताकर उन नाराज़ सवर्ण और युवा वोटरों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन रहे हैं।
- हम (सेक्युलर): जीतन राम मांझी का प्रभाव भले ही कुछ इलाकों तक सीमित हो, लेकिन छोटे-छोटे जातीय समीकरणों पर उनका असर कई सीटों पर निर्णायक साबित हो सकता है।
- निर्दलीय और बाग़ी: गलत टिकट वितरण की स्थिति में कई सीटों पर मजबूत निर्दलीय या बाग़ी उम्मीदवार जातीय समीकरणों को पूरी तरह बदलने का दम रखते हैं।
नालंदा के सिलाव बाजार में एक व्यापारी कहते हैं, “भाजपा अगर अपनी गलती नहीं सुधारेगी, तो वोटर बंट जाएगा। फिर कोई चिराग ले जाएगा, कोई मांझी या कोई निर्दलीय जीत जाएगा। लड़ाई अब दोतरफा नहीं, कई कोनों से होगी।”
पटना से पूर्णिया तक बदल सकता है खेल
अगर 2020 के नतीजों को देखें तो कई सीटों पर जीत-हार का अंतर कुछ सौ वोटों का था। इस बार भी मुकाबला कांटे का रहने की उम्मीद है। ऐसे में अगर भाजपा का कोर वोट बैंक 5-7% भी खिसकता है, तो इसका असर पटना से लेकर पूर्णिया तक दिखाई देगा। मगध और शाहाबाद में राजपूत-भूमिहार वोटों के छिटकने से LJP(RV) और JD(U) को फायदा हो सकता है, तो मिथिला-कोसी में निर्दलीय और जेडीयू मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं।
स्पष्ट है कि 2025 का चुनाव सिर्फ भाजपा बनाम महागठबंधन नहीं होगा। यह उन ‘तीसरे खिलाड़ियों’ का भी चुनाव होगा, जो सही समय पर सही चाल चलकर पूरे खेल का रुख अपनी ओर मोड़ सकते हैं।