औरंगाबाद में गूंजा ‘बदलाव’ का बिगुल: जनसुराज पार्टी की सभा में उमड़ा जनसैलाब, नेताओं ने नीतीश-भाजपा पर साधा निशाना

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औरंगाबाद/देव।
आगामी बिहार विधानसभा चुनाव से पहले जनसुराज पार्टी ने औरंगाबाद विधानसभा क्षेत्र के देव प्रखंड के खखड़ा गांव से बदलाव का बिगुल फूंक दिया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और संभावित प्रत्याशी प्रो. अनिल कुमार सिंह के समर्थन में आयोजित “बिहार बदलाव सभा” में ग्रामीणों की भारी भीड़ उमड़ी।

सभा में पार्टी नेताओं ने 35 साल की बदहाली, जातिवाद की राजनीति और प्रवासी बिहारियों की दुर्दशा को मुद्दा बनाते हुए नीतीश कुमार और भाजपा पर जमकर निशाना साधा।


“जाति से ऊपर उठकर बदलाव का वक्त” – चौहान

सभा को संबोधित करते हुए जिला महासचिव रामजी चौहान ने कहा कि बिहार की जनता को अब जाति-पाति से ऊपर उठकर बदलाव की राजनीति को अपनाना होगा। उन्होंने अपील की कि “जनसुराज को एक अवसर दीजिए, बिहार बदल जाएगा।”


“35 साल की बदहाली का हिसाब जनता लेगी” – बृज मोहन सिंह

जिला अध्यक्ष बृज मोहन सिंह ने कहा कि 35 वर्षों से बिहार शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मामले में पिछड़ गया है।
“जनसुराज पार्टी को अवसर मिला तो हम तय समय में बदलाव साबित कर दिखाएंगे।”


मगही में बोला दिल, “मतदान चूकिए मत” – उपेन्द्र वर्मा

सभा में जिला प्रभारी उपेन्द्र नाथ वर्मा ने मगही भाषा में जनता से संवाद किया और कहा कि मगध की बदहाली किसी से छिपी नहीं है।
“यह हमारी पीढ़ी का सौभाग्य है कि हमें नया बिहार बनाने का मौका मिला है। इस बार चूकिए मत, जनसुराज को वोट दीजिए।”


“बिहारी शब्द गाली क्यों?” – प्रो. अनिल सिंह

सभा के मुख्य आकर्षण प्रो. अनिल कुमार सिंह ने प्रवासी बिहारियों की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा:
“आज पूरे देश में ‘बिहारी’ शब्द गाली की तरह इस्तेमाल होता है। जब तक बिहार नहीं बदलेगा, यह कलंक नहीं मिटेगा। बिहार को बदलने की ताकत सिर्फ जनसुराज पार्टी में है।”
उन्होंने जनता से कम से कम एक बार मौका देने की अपील की।


बदलते समीकरण की आहट

सभा में सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे, जिसमें प्रदीप सिंह, मनोज सिंह, अभय सिंह, उदय सिंह, नीरज कुमार, लवकुश कुमार, अजय कुमार सिंह, आशुतोष सिंह समेत कई स्थानीय चेहरे शामिल थे।
सभा के अंत में धन्यवाद ज्ञापन उपेंद्र सिंह ने किया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, औरंगाबाद की यह सभा संकेत है कि जनसुराज पार्टी धीरे-धीरे ग्रामीण इलाकों में पैठ बना रही है और चुनावी मैदान में मौजूदा समीकरणों को चुनौती दे सकती है।

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