बिहार की सियासत: कुर्सी का जुनून, दोस्ती-दुश्मनी का ड्रामा और ‘पलटीमार’ बाज़ीगरों का खेल!

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बिहार की राजनीति एक ऐसी उलटफेर से भरी पिच है, जहाँ हर गेंद पर सियासी बाज़ी पलट जाती है! यहाँ न कोई स्थायी दोस्त है, न कोई स्थायी दुश्मन; बस है तो कुर्सी का अदम्य जुनून और उस तक पहुँचने के लिए खेले जाने वाले धमाकेदार दांव-पेंच। यह ऐसा राजनीतिक ड्रामा है, जिसमें हर किरदार अपने आप में एक कहानी है, और हर कहानी अगले मोड़ का इंतज़ार कराती है।

नीतीश का ‘पलटी-पहाड़ा’: जब सुशासन बाबू ने बदल डाली बिहार की तक़दीर!



बिहार की राजनीति में अगर कोई नाम सबसे ज़्यादा सियासी भूचाल लाने वाला है, तो वह हैं नीतीश कुमार। ‘सुशासन बाबू’ की उपाधि से लेकर ‘पलटीमार’ के तमगे तक, उनका सफ़र किसी फ़िल्मी थ्रिलर से कम नहीं। 2005 में जब उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर लालू राज को चुनौती दी, तो बिहार में एक नया अध्याय शुरू हुआ। सड़कों पर रौशनी आई, क़ानून-व्यवस्था सुधरी और नीतीश ने ‘विकास पुरुष’ की छवि गढ़ ली।

मुख्यमंत्री बिहार -नीतीश कुमार http://www.magadhexpress.in


मगर, सियासी चक्र ने कब पलटी मारी, कोई नहीं जानता। 2013 में भाजपा से रिश्ता तोड़ना, फिर 2015 में धुर-विरोधी लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाना और ‘महागठबंधन’ की सरकार बनाना… यह ऐसा दांव था जिसने सबको चौंका दिया। बिहार के गलियारों में यही चर्चा थी कि लालू-नीतीश की दोस्ती क्या रंग लाएगी? लेकिन ये अटूट दिखने वाली दोस्ती भी ज़्यादा दिन नहीं टिकी। 2017 में भ्रष्टाचार के आरोपों के बहाने नीतीश ने अचानक महागठबंधन से किनारा कर लिया और फिर से भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। इस एक फ़ैसले ने उन्हें ‘पलटीमार’ का तमगा तो दिया, लेकिन कुर्सी पर उनकी पकड़ और मज़बूत हो गई।

बिहार के सियासी पंडित आज भी ये सोचते हैं कि 2025 में नीतीश कुमार का अगला ‘पलटी-पहाड़ा’ क्या होगा? क्या कुर्सी के लिए वह एक बार फिर कोई नया सियासी गठबंधन बनाएंगे या पुराने साथियों पर ही भरोसा जताएंगे?

लालू का ‘लालटेन’ और तेजस्वी का तूफान: क्या बिहार में लौटेगा ‘बाहुबली’ का राज?



एक तरफ़ नीतीश के सियासी दांव-पेंच हैं, तो दूसरी तरफ़ बिहार की राजनीति के सबसे करिश्माई और विवादित नेता लालू प्रसाद यादव की विरासत। चारा घोटाले के आरोपों और जेल की सज़ा के बावजूद, लालू की ‘लालटेन’ (राजद का चुनाव चिह्न) बिहार में आज भी जल रही है। उनके बिना भी उनकी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (राजद), बिहार की सबसे बड़ी पार्टियों में से एक है।

तेजस्वी यादव


लालू की अनुपस्थिति में उनके बेटे, तेजस्वी यादव ने जिस तरह से पार्टी की कमान संभाली है, वह किसी सियासी तूफान से कम नहीं। युवा तेजस्वी ने न सिर्फ़ राजद को एकजुट रखा, बल्कि अपनी तेज़तर्रार भाषण शैली और आक्रामक तेवरों से विरोधियों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। 2020 के विधानसभा चुनाव में, तेजस्वी ने अकेले दम पर महागठबंधन को मज़बूत किया और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कड़ी टक्कर दी। आज भी तेजस्वी यादव बिहार में विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा हैं। क्या तेजस्वी अपने पिता की तरह आम जनता के दिलों पर राज कर पाएंगे? क्या ‘लालटेन’ की रोशनी में बिहार में फिर से लालू परिवार का दबदबा कायम होगा? यह सवाल हर चुनावी मौसम में बिहार की गलियों में गूंजता है, क्योंकि लालू की विरासत और तेजस्वी का संघर्ष, दोनों ही बिहार की राजनीति की सबसे रोमांचक कहानियाँ हैं।

गठबंधन का ‘अखाड़ा’: बिहार में दोस्ती-दुश्मनी का वो खेल, जो हर बार बदलता है पासा!



बिहार की राजनीति में गठबंधन सिर्फ़ एक चुनावी समझौता नहीं, बल्कि एक अखाड़ा है, जहाँ हर दांव पर पासा पलट जाता है। यहाँ कोई भी दल अकेले दम पर सत्ता में आने का सपना नहीं देख सकता। चुनावों से पहले और बाद में सियासी दोस्त और दुश्मन ऐसे बदलते हैं, जैसे हवा का रुख़।


इस ‘गठबंधन-गामा’ में छोटे दल और निर्दलीय विधायक भी किंगमेकर बन जाते हैं। उनकी थोड़ी सी संख्या भी सत्ता के समीकरण को हिलाने के लिए काफ़ी होती है। बिहार में अक्सर देखा गया है कि गठबंधन विचारधारा के बजाय सत्ता की प्राप्ति के उद्देश्य से बनते हैं। यहाँ कब कोई पुराना विरोधी गले लग जाए और कब करीबी दोस्त पीठ में छुरा घोंप दे, कोई नहीं जानता।


आने वाले 2025 के विधानसभा चुनावों में भी गठबंधन की राजनीति केंद्रीय भूमिका में होगी। महागठबंधन में मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर खींचतान जारी है, वहीं भाजपा भी अपनी सहयोगी पार्टियों के साथ तालमेल बिठाने में जुटी है। बिहार की सियासी बिसात पर इस बार कौन सा नया ‘खेल’ खेला जाएगा, कौन किसके साथ आएगा और कौन किसको धोखे देगा, ये देखना वाकई सबसे बड़ा सवाल है।
बिहार की राजनीति हमेशा से ही अचंभित करने वाली, जीवंत और नाटकीय रही है। यहाँ के नेता अपनी जनता से सीधे जुड़ाव, बदलते समीकरणों और अप्रत्याशित घटनाओं के लिए जाने जाते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में बिहार की सियासत कौन सा नया रंग लेती है और कौन सा ‘सियासी बाज़ीगर’ बिहार की कुर्सी पर राज करेगा।

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