2020 का LJP दांव: चिराग के ‘बिहार फर्स्ट’ ने कैसे बदली सियासी बिसात और आज क्या है उनकी ताकत?

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नवंबर 2020 में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव, लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुए। चिराग पासवान के नेतृत्व में, पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन से बाहर जाकर ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ के नारे के साथ अकेले 137 सीटों पर चुनाव लड़ा। यह एक ऐसा दांव था जिसने न केवल LJP के भविष्य को आकार दिया, बल्कि बिहार की सत्ता के समीकरणों को भी अप्रत्याशित रूप से बदल दिया। आइए, 2020 के सीट-वार आंकड़ों पर गौर करते हुए LJP के प्रदर्शन और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में चिराग पासवान की भूमिका का विश्लेषण करें।


2020 का LJP का ‘एकला चलो’ दांव: आंकड़े और प्रभाव
2020 के विधानसभा चुनाव में, लोक जनशक्ति पार्टी (उस समय अविभाजित LJP) ने कुल 137 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। परिणाम चौंकाने वाले थे:

जीती गई सीटें: मात्र 1 सीट (मटिहानी)

कुल वोट शेयर: लगभग 5.66%

प्रभावित सीटें: LJP ने भले ही एक सीट जीती, लेकिन उसने कई सीटों पर, खासकर जनता दल (यूनाइटेड) (JD(U)) के मजबूत गढ़ों में, NDA के वोट काटे। अनुमानों के अनुसार, LJP ने JD(U) को 28-34 सीटों पर सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाया, जिससे उनकी सीटों की संख्या 2015 के 71 से घटकर 43 रह गई। इस कारण भाजपा 74 सीटों के साथ NDA में बड़े भाई की भूमिका में आ गई।

दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार: LJP के उम्मीदवार कम से कम 9 सीटों पर दूसरे स्थान पर रहे, जो यह दर्शाता है कि उनका प्रभाव केवल एक सीट तक सीमित नहीं था, बल्कि वे कई जगहों पर निर्णायक वोट खींचने में सफल रहे।


प्रमुख उदाहरण जहां LJP ने परिणाम को प्रभावित किया:

ओबरा: ओबरा में LJP के प्रकाश चंद्र ने 40,799 वोट हासिल कर जदयू उम्मीदवार को तीसरे स्थान पर धकेल दिया और राजद की जीत में परोक्ष रूप से मदद की।

अन्य जदयू-प्रभावित सीटें: बिहार के कई क्षेत्रों में जहां जदयू मजबूत मानी जाती थी, वहां लोजपा के उम्मीदवारों ने पर्याप्त वोट हासिल किए, जिससे सीधे मुकाबले में जदयू को नुकसान हुआ और महागठबंधन के उम्मीदवारों को फायदा मिला।


यह रणनीति, जिसे “नीतीश मुक्त बिहार” के रूप में भी देखा गया, ने भले ही LJP को अधिक सीटें नहीं दिलाईं, लेकिन इसने बिहार के राजनीतिक मानचित्र को निश्चित रूप से बदल दिया।

2020 के बाद LJP में बिखराव और चिराग का पुनरुत्थान



2020 के चुनावों के बाद, LJP में बड़ा विभाजन हुआ। रामविलास पासवान के निधन के बाद, पार्टी उनके बेटे चिराग पासवान और भाई पशुपति कुमार पारस के बीच बंट गई। चिराग ने लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) का नेतृत्व किया, जबकि पशुपति पारस ने राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) बनाई। इस विभाजन ने चिराग के राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया था।
लेकिन चिराग पासवान ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने पिता की विरासत और ‘बिहार फर्स्ट’ के नारे को आगे बढ़ाते हुए राज्यभर में जनसंपर्क अभियान चलाया। 2024 के लोकसभा चुनावों में उनकी रणनीति रंग लाई। NDA के भीतर उन्हें 5 सीटें मिलीं, और LJP (रामविलास) ने सभी 5 सीटों पर शानदार जीत हासिल की, जिससे उनका वोट शेयर बढ़कर 6.47% हो गया। इस जीत ने चिराग को एक बार फिर बिहार की राजनीति में एक मजबूत दावेदार के रूप में स्थापित कर दिया और उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री पद भी मिला।

वर्तमान परिस्थिति और 2025 की चुनौतियां



जुलाई 2025 की वर्तमान स्थिति में, चिराग पासवान बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन गए हैं, और उनकी नजर अब आगामी विधानसभा चुनावों पर है।

NDA में चिराग की स्थिति: 2024 के लोकसभा चुनावों की सफलता के बाद, चिराग पासवान NDA में एक मजबूत सहयोगी के रूप में उभरे हैं। उनके और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच पहले के तनाव के बावजूद, अब चिराग सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार के नेतृत्व को स्वीकार कर रहे हैं, जो NDA की एकजुटता का संकेत है।

मुख्यमंत्री पद की आकांक्षाएं: हाल ही में चिराग पासवान ने संकेत दिया है कि वे अब केंद्रीय राजनीति से अधिक बिहार की राजनीति पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। उनके पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा उन्हें मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश करने की बात भी सामने आ रही है। हालांकि, भाजपा ने स्पष्ट किया है कि अगला विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि सीट-बंटवारे में चिराग कितना दबाव बनाने में सफल रहते हैं, खासकर शाहबाद क्षेत्र (भोजपुर, रोहतास, कैमूर, बक्सर) में, जहां उनकी पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षण में मजबूत समर्थन दिखा है।

जातिगत समीकरण और ‘सर्व समाज’ नेता की छवि: पासवान समुदाय के एक प्रमुख नेता होने के बावजूद, चिराग खुद को केवल एक समुदाय का नेता नहीं, बल्कि ‘सर्व समाज’ का नेता साबित करना चाहते हैं। उनके बयान और रैलियां इस दिशा में एक स्पष्ट संकेत हैं।

राजद से मुकाबला और विपक्ष पर हमला: चिराग पासवान लगातार राजद और महागठबंधन पर हमलावर रहे हैं, खासकर ‘जॉब फॉर लैंड’ घोटाले और अन्य मुद्दों पर। वे विपक्ष द्वारा संविधान और आरक्षण को खतरे में बताने के दावों को “झूठा नैरेटिव” करार देते हैं।

सीट बंटवारे की चुनौती: 2024 लोकसभा में 5/5 का स्ट्राइक रेट हासिल करने के बाद, LJP (रामविलास) स्वाभाविक रूप से 2025 विधानसभा में अधिक सीटों की मांग करेगी (संभावित रूप से 25-40 सीटें)। यह NDA के भीतर अन्य सहयोगियों जैसे जीतन राम मांझी की हम (HAM) और उपेंद्र कुशवाहा की रालोजद (RLJD) के साथ सीट-बंटवारे को जटिल बना सकता है। मांझी ने तो चिराग को 2020 की रणनीति न दोहराने की चेतावनी भी दी है।

चिराग की रणनीति और बिहार का भविष्य



चिराग पासवान ने 2020 में एक बड़ा जोखिम उठाया था, जिसने भले ही उन्हें सीट के मामले में लाभ न दिया हो, लेकिन इसने उन्हें एक राजनीतिक ब्रांड के रूप में स्थापित किया और जदयू को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2024 की लोकसभा सफलता ने उन्हें फिर से केंद्र में ला दिया है।


वर्तमान में, चिराग पासवान एक ऐसे नेता के रूप में उभर रहे हैं जो NDA के भीतर रहकर भी अपनी स्वतंत्र पहचान और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को साध रहे हैं। 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में, LJP (रामविलास) की भूमिका निर्णायक हो सकती है, न केवल जीती गई सीटों की संख्या के संदर्भ में, बल्कि NDA के समग्र प्रदर्शन और सत्ता समीकरणों को प्रभावित करने में भी। चिराग का “बिहार फर्स्ट” का संकल्प और उनकी युवा अपील, उन्हें बिहार की जटिल राजनीति में एक महत्वपूर्ण और अप्रत्याशित शक्ति बनाए रखती है।

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