अपने बने भस्मासुर: भोजपुरी सिनेमा का स्वर्णिम अतीत और आत्मघाती वर्तमान
पटना: भोजपुरी सिनेमा, जिसने कभी अपनी मिट्टी की महक और जीवनशैली को बड़े पर्दे पर उतारा था, आज अपनी ही पहचान के संकट से जूझ रहा है। “गंगा मईया तोहे पियरी चढैबो” जैसी ऐतिहासिक शुरुआत से लेकर “ससुरा बड़ा पैसा वाला” जैसी ब्लॉकबस्टर तक का सफर तय करने वाली भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री, अब अपनी जड़ों से कटती और बॉलीवुड की सस्ती नकल बनती जा रही है। हैशटैग #अपनेबनेभस्मासुर आज की स्थिति को सटीक रूप से बयां करता है।
एक विशाल दर्शक वर्ग, फिर भी धीमी शुरुआत:
भोजपुरी सिनेमा का दर्शक वर्ग हमेशा से विशाल रहा है। न केवल बिहार और उत्तर प्रदेश में, बल्कि बंगाल, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और तो और मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, अमेरिका, हॉलैंड, नेपाल और अफ्रीकी देशों तक में भोजपुरीभाषी दर्शक बड़ी संख्या में मौजूद हैं। बावजूद इसके, “गंगा मईया तोहे पियरी चढैबो” (निर्माता: बनारस के कुंदन कुमार) के बाद दूसरी फिल्म “बिदेसिया” (सुजीत कुमार, पद्मा खन्ना अभिनीत) आने में लंबा अंतराल लगा। “लागी छूटे नही राम” और नजीर हुसैन निर्देशित “बलम परदेसिया” (राकेश पाण्डेय, पद्मा खन्ना) जैसी फिल्मों ने धीरे-धीरे इस विधा को गति दी।
स्वर्णिम दौर की झलक:
“माई के सौगंध”, “गंगा घाट” और विशेष रूप से “दंगल” जैसी फिल्मों ने भोजपुरी सिनेमा को पहचान दिलाई। दिलीप बोस की 1983-84 की ब्लॉकबस्टर “दूल्हा गंगा पार के” (कुणाल, गौरी खुराना) ने अपने बेहतरीन गीत-संगीत से धूम मचाई। इसके बाद “गंगा किनारे मोरा गांव” ने बाजार को और बढ़ाया। अमजद खान की “गोदना” और के. से. बोकाडिया की “गंगाजल” जैसी फिल्मों से बॉलीवुड के नामी चेहरे भी इस ओर आकर्षित हुए। मोहन जी प्रसाद (हमार भौजी), सुजीत कुमार (पान खाए सैय्या हमार), और कुणाल सिंह (हमार दूल्हा) जैसे निर्देशकों ने भोजपुरी की आत्मा को सही मायने में पर्दे पर उतारा। “पिया रखिह सेनुरवा के लाज”, “बैरी कंगना”, “दगाबाज़ बलमा” जैसी फिल्मों ने भोजपुरी समाज की सही तस्वीर पेश की। 90 के दशक में मोहन जी प्रसाद की “हमार सजना” और दीपिका (टीवी की सीता) अभिनीत “सजनवा बैरी हो गईले हमार” ने एक बार फिर भोजपुरी मार्केट को जिंदा किया।
नए सितारों का उदय और पतन की शुरुआत:
भरत शर्मा, शारदा सिन्हा, महेंद्र मिश्रा, बालेश्वर यादव, मुन्ना सिंह जैसे कलाकारों ने भोजपुरी गीतों को जीवित रखा। मनोज तिवारी, आनंद मोहन, कल्पना, देवी जैसे कलाकारों ने इसे और लोकप्रिय बनाया। मनोज तिवारी ने फिल्मों में कदम रखा और “ससुरा बड़ा पैसा वाला” से सुपरस्टार बन गए, जिसने कमाई के मामले में कई हिंदी फिल्मों को पीछे छोड़ दिया। हिंदी फिल्मों में छोटे रोल करने वाले रवि किशन को भोजपुरी सिनेमा ने “गंगा जैसन माई हमार” जैसी हिट फिल्म देकर बड़ा स्टार बनाया। यह वो दौर था जब भोजपुरी फिल्में नया इतिहास रच रही थीं और क्षेत्रीय पहचान के साथ मजबूती से उपस्थित थीं।
आत्मघाती राह पर भोजपुरी सिनेमा:
लेकिन, आज की स्थिति चिंताजनक है। क्षेत्रीय फिल्मों के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे उस क्षेत्र की भावभूमि से पूरी तरह जुड़ी हों। व्यावसायिकता जरूरी है, लेकिन वह सिर्फ आर्थिक न होकर प्रोफेशनलिज्म से जुदा हो। दुर्भाग्य से, आज की भोजपुरी फिल्मों में इसी की कमी खलती है। हिंदी फिल्मों के ‘मसालों’ का अंधाधुंध अनुकरण भोजपुरी सिनेमा को खोखला कर रहा है। मनोज तिवारी अभिनीत “धरतीपुत्र” का एक गाना, जो सीधे हिंदी फिल्म ‘फाइट क्लब’ के गाने “छोरे की आँखें शराबी है इनमें नशा भी…” का भोजपुरी अनुवाद था, इसका एक कड़वा उदाहरण है। गोवा के बीच पर बिकनी और शॉर्ट्स में फिल्माया गया गीत जब गांव की छत या खेत में धोती-कुर्ता और लहंगा-चोली पहने कलाकारों पर फिल्माया जाता है, तो वह हास्यास्पद और भोंडा लगता है।
आत्म-चिंतन की आवश्यकता
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भोजपुरी फिल्मों का बाजार बढ़ चुका है, दर्शकों का अपनापन भी है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि हम अपनी ही ‘स्टफ’ को नए तरीके से पेश करें, अपनी ही संस्कृति और परिवेश से जुड़ी कहानियों को सामने लाएं। अगर भोजपुरी सिनेमा अपनी जड़ों से कटकर हिंदी फिल्मों की नकल बनता रहेगा, तो दर्शक वर्ग का मोहभंग होना तय है। भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को आत्म-चिंतन करना होगा, वरना वह दिन दूर नहीं जब #अपनेबनेभस्मासुर की यह कहावत पूरी तरह से सच साबित हो जाएगी, और भोजपुरी सिनेमा अपने ही हाथों अपना विनाश कर बैठेगा।
लेखक – अनूप नारायण सिंह