बिहार में ‘सनातन’ की नई अलख: 2500 मंदिरों का एक सुर, एक विधान; सरकार ने तैयार किया ‘धर्म-प्रचार’ का मेगा प्लान
पटना: बिहार के मंदिरों में अब सिर्फ घंटियों की आवाज ही नहीं, बल्कि एक साथ, एक समय पर एक जैसी पूजा-अर्चना का विधान भी दिखाई देगा। बिहार सरकार ने राज्य में सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार को एक व्यवस्थित रूप देने के लिए एक अनोखा और बड़ा फैसला लिया है। अब सरकारी फाइलों से निकलकर धर्म की ध्वजा थामने के लिए हर जिले में एक विशेष ‘सारथी’ यानी संयोजक (Coordinator) तैनात होगा।
क्या है सरकार का ‘मिशन सनातन’?
बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद (BSRTC), जो विधि विभाग के अंतर्गत आती है, ने तय किया है कि राज्य के सभी 38 जिलों में एक-एक संयोजक नियुक्त किया जाएगा। इनका काम केवल प्रशासनिक देखरेख नहीं, बल्कि धार्मिक चेतना को जगाना होगा। परिषद के अध्यक्ष रणबीर नंदन ने इस ‘मेगा प्लान’ का खुलासा करते हुए बताया कि ये संयोजक सीधे तौर पर राज्य के 2,499 पंजीकृत मठों और मंदिरों के मुख्य पुजारियों से जुड़ेंगे।
हर पूर्णिमा और अमावस्या को दिखेगा खास नजारा
इस योजना की सबसे दिलचस्प बात वह ‘धार्मिक कैलेंडर’ है जिसे लागू करने की तैयारी है। अब मंदिरों में पूजा का पैटर्न भी सिंक्रोनाइज्ड (एक जैसा) होगा:
- पूर्णिमा के दिन: हर पंजीकृत मंदिर में ‘सत्यनारायण भगवान की कथा’ गूंजेगी।
- अमावस्या के दिन: विशेष ‘भगवती पूजा’ का आयोजन होगा।
संयोजकों की जिम्मेदारी होगी कि वे सुनिश्चित करें कि न केवल यह पूजा हो, बल्कि इसका महत्व आम जनता तक पहुंचे। मकसद साफ है—भक्तों को मंदिरों से भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से और गहराई से जोड़ना।
मंदिरों की ‘मॉनिटरिंग’ से आगे ‘मेंटरिंग’ तक
अब तक धार्मिक न्यास परिषद का काम मुख्य रूप से मंदिरों की संपत्ति का रिकॉर्ड रखना और उनकी सुरक्षा करना था। लेकिन इस फैसले ने परिषद की भूमिका बदल दी है। अब यह संस्था ‘मॉनिटरिंग’ के साथ-साथ धार्मिक अनुष्ठानों की ‘मेंटरिंग’ भी करेगी।
यह पहल बिहार के धार्मिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने वाली है, जहां 38 संयोजक और 2500 पुजारी मिलकर सनातन परंपरा को एक सूत्र में पिरोने का काम करेंगे।
खबर की मुख्य बातें (Key Highlights):
- नई नियुक्ति: बिहार के सभी 38 जिलों में सनातन धर्म प्रचार के लिए संयोजक (Coordinators) बनेंगे।
- नेटवर्क: ये संयोजक 2,499 रजिस्टर्ड मंदिरों/मठों के मुख्य पुजारियों के साथ समन्वय करेंगे।
- अनिवार्य पूजा: हर पूर्णिमा को ‘सत्यनारायण कथा’ और अमावस्या को ‘भगवती पूजा’ सुनिश्चित की जाएगी।
- उद्देश्य: जनता के बीच इन पूजाओं के महत्व का संदेश फैलाना और धार्मिक माहौल को सुदृढ़ करना।