औरंगाबाद का सियासी U-Turn: एक दशक में NDA के किले को भेदकर RJD कैसे बनी जिले की बेताज बादशाह?

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औरंगाबाद, बिहार। बिहार की राजनीति में औरंगाबाद जिला कभी एनडीए, खासकर जदयू और भाजपा का मजबूत किला माना जाता था। लेकिन पिछले एक दशक के चुनावी आंकड़े एक ऐसी कहानी बयां करते हैं, जिसमें राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने न सिर्फ इस किले में सेंध लगाई, बल्कि 2020 तक इसे पूरी तरह से फतह कर लिया। 2010 के विधानसभा चुनाव में जो एनडीए जिले की छह में से पांच सीटों पर काबिज थी, वही 2020 में एक भी सीट जीतने को तरस गई। यह विश्लेषण औरंगाबाद के बदलते सियासी समीकरण और राजद के शून्य से शिखर तक के सफर को दर्शाता है।

2010: जब जिले में NDA की तूती बोलती थी

​साल 2010 का विधानसभा चुनाव औरंगाबाद में एनडीए के लिए स्वर्णिम काल जैसा था। जिले की छह विधानसभा सीटों में से पांच पर एनडीए प्रत्याशियों ने शानदार जीत दर्ज की। जदयू ने रफीगंज, नवीनगर, कुटुंबा और गोह में परचम लहराया, तो वहीं औरंगाबाद सदर सीट पर भाजपा ने कब्जा जमाया। राजद की हालत बेहद पतली थी। गोह सीट पर उसके प्रत्याशी राम अयोध्या प्रसाद यादव मात्र 694 वोटों के मामूली अंतर से चुनाव हार गए, जबकि अन्य सीटों पर हार का अंतर काफी बड़ा था। ओबरा सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी की जीत ने समीकरण को थोड़ा बदला, लेकिन जिले पर एनडीए की पकड़ निर्विवाद थी।

2015: महागठबंधन का प्रयोग और बदलती हवा

​2015 का चुनाव बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव का गवाह बना, जब राजद और जदयू ने मिलकर महागठबंधन बनाया। इस गठबंधन का असर औरंगाबाद में भी दिखा। सीटों के बंटवारे के कारण राजद ने कई सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारे, लेकिन गठबंधन के तौर पर एनडीए को कड़ी टक्कर दी। राजद ने ओबरा सीट पर शानदार जीत हासिल की, जबकि उसकी सहयोगी कांग्रेस ने कुटुंबा और औरंगाबाद जैसी महत्वपूर्ण सीटें एनडीए से छीन लीं। हालांकि, रफीगंज, नवीनगर और गोह में एनडीए अपनी सीटें बचाने में कामयाब रहा। इस चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया कि औरंगाबाद में एनडीए का किला अब उतना अभेद्य नहीं रहा।

2020: राजद की ‘सुनामी’ में बह गया NDA का किला

​2020 का विधानसभा चुनाव आते-आते जिले की सियासी हवा पूरी तरह बदल चुकी थी। इस बार राजद ने अकेले दम पर ऐसी प्रचंड वापसी की कि एनडीए के सारे समीकरण धरे के धरे रह गए। राजद ने जिले की चार सीटों— रफीगंज, ओबरा, नवीनगर और गोह— पर बड़े अंतर से जीत हासिल की। गोह में जहां 2010 में राजद 694 वोटों से हारी थी, वहीं 2020 में 35,618 वोटों के विशाल अंतर से जीती। बाकी बची दो सीटें— कुटुंबा और औरंगाबाद— एक बार फिर राजद की सहयोगी कांग्रेस के खाते में गईं। इस तरह, 2020 में एनडीए का जिले से पूरी तरह सूपड़ा साफ हो गया।

क्या कहते हैं रुझान?

​आंकड़े साफ तौर पर दिखाते हैं कि पिछले एक दशक में औरंगाबाद जिले में राजद का ग्राफ लगातार चढ़ा है, जबकि एनडीए की जमीन खिसकती गई है।

  • वोटों का स्विंग: 2010 में जहां राजद के प्रत्याशी संघर्ष करते दिख रहे थे, वहीं 2020 में उन्होंने 40% से अधिक वोट शेयर के साथ बड़ी जीत दर्ज की।
  • रणनीतिक सफलता: 2015 में महागठबंधन के साथी के रूप में और 2020 में मुख्य दल के रूप में, राजद ने अपनी रणनीति को सफलतापूर्वक जमीन पर उतारा।
  • एनडीए का पतन: जो एनडीए 2010 में जिले की राजनीति का केंद्र था, वह 2020 तक हाशिये पर चला गया। उसके पारंपरिक गढ़ भी दरक गए।

​कुल मिलाकर, औरंगाबाद ने दस साल में एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखा है। राजद ने धैर्यपूर्वक अपनी जमीन तैयार की और सही समय पर एनडीए के किले को ध्वस्त कर खुद को जिले की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित कर लिया।

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