औरंगाबाद में “स्वास्थ्य सेवा” या खुला Regulatory Collapse? नवजात शिशुओं की जिंदगी, आम जनता की सुरक्षा और कानून—क्या सब कुछ रसूख के आगे बौना हो चुका है?

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औरंगाबाद जिला आज एक बेहद असहज और खतरनाक सवाल के सामने खड़ा है। सवाल सिर्फ कुछ निजी अस्पतालों, चाइल्ड क्लिनिक्स या तथाकथित NICU यूनिट्स का नहीं है। सवाल उस पूरे सिस्टम का है जिसने इन संस्थानों को फलने-फूलने दिया। सवाल उन विभागों का है जिनकी जिम्मेदारी कानून लागू करना थी, लेकिन जिनकी चुप्पी अब खुद कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है।

जिले में तेजी से उभरे निजी मेडिकल कॉम्प्लेक्स को देखकर पहली नजर में लगता है मानो स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो रहा हो। चमचमाती इमारतें, बड़े-बड़े बोर्ड, मॉडर्न और अत्याधुनिक NICU के दावे, भारी परामर्श फीस और intensive care के नाम पर मोटी रकम। लेकिन इन चमकदार दीवारों के पीछे यदि नियम, सुरक्षा और न्यूनतम मानकों की ही अनदेखी हो रही हो, तो फिर यह विकास नहीं बल्कि बेहद खतरनाक अव्यवस्था है।

बिना पार्किंग के निजी अस्पतालों और क्लीनिक को कैसे मिल गया लाइसेंस

निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम को लाइसेंस देते वक्त तमाम नियम शर्तों को पूरा किया जाना है। अस्पताल या नर्सिंग होम शुरू करने से पहले विभाग की टीम को मौके पर पार्किंग दिखाना होता है। आखिर वे अस्पताल जो संचालित हो रहे हैं, लेकिन उनके पास पार्किंग व्यवस्था नहीं है। उनको स्वास्थ्य विभाग ने किस तरह से लाइसेंस जारी कर दिया। अब अस्पतालों के सामने वाहनों को खड़ा किया जा रहा है, जिससे सड़क जाम हो रही है। आम जनता इससे खासी परेशान है।

औरंगाबाद में आज इन हॉस्पिटलों के सामने सड़कों पर खड़ी मरीजों की गाड़ियां केवल ट्रैफिक प्रॉब्लम नहीं हैं। वे उस प्रशासनिक विफलता की जीवित तस्वीर हैं जिसने कमर्शियल मेडिकल एक्टिविटी को रेसिडेंशियल एरिया के भीतर भी बिना पार्किंग स्पेस के फलने-फूलने दिया। नगर परिषद के नियम स्पष्ट हैं : कमर्शियल एस्टेब्लिशमेंट, विशेषकर हॉस्पिटल और नर्सिंग होम्स, बिना उचित पार्किंग व्यवस्था के संचालित नहीं हो सकते यहां तक कि उन्हें लाइसेंस नहीं मिल सकता। किसी भी कीमत पर इमरजेंसी एक्सेस बाधित नहीं होना चाहिए। पब्लिक रोड को इन हॉस्पिटलों के स्थायी पार्किंग में बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

अब सवाल यह उठ रहा है कि:

  • यदि तमाम नियम और दिशानिर्देश के बावजूद लाइसेंस मिल गया तो किसके दस्तखत के साथ?
  • क्या बिना सत्यापन के लाइसेंस जारी करने वाली और मॉनिटरिंग ऑथोरिटी पर कार्रवाई की गई?
  • यदि नहीं तो पार्किंग व्यवस्था नहीं है यह जानते हुए भी लाइसेंस जारी करने वाले जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई की जाएगी।

औरंगाबाद जिले में नगर परिषद से लेकर स्वास्थ्य विभाग तथा विभिन्न लाइसेंसिंग और मॉनिटरिंग ऑथोरिटी की मौन स्वीकृति और कागजी खानापूर्ति

यह सवाल केवल अस्पतालों से नहीं, सीधे औरंगाबाद नगर परिषद से पूछा जाना चाहिए।

  • ट्रेड लाइसेंस किस आधार पर जारी हुए?
  • क्या ग्राउंड इंस्पेक्शन हुआ था?
  • क्या बिल्डिंग मैप अप्रूवल में उचित पार्किंग व्यवस्था दिखाई गई थी?
  • यदि दिखाई गई थी, तो जमीन पर पार्किंग है कहाँ?
  • यदि नहीं थी, तो फिर लाइसेंस जारी कैसे हुआ?

और यदि इन सबके बावजूद वर्षों से संचालन जारी है, तो क्या यह मान लिया जाए कि नियम केवल कागजों के लिए हैं?

न्यू एरिया स्थित नारायणा चाइल्ड हॉस्पिटल के NICU यूनिट की स्थिति और भी भयावह

जिले के न्यू एरिया स्थित नारायणा चाइल्ड हॉस्पिटल और उसके तथाकथित NICU यूनिट्स को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं, वे और अधिक भयावह हैं। NICU (Neonatal Intensive Care Unit) कोई सामान्य वार्ड नहीं होता। वहां जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे नवजात शिशु रखे जाते हैं। वहां इन्फेक्शन प्रोटोकॉल ही सबसे बड़ा प्रोटोकॉल होता है।

लेकिन यदि वहां स्टाफ बिना ग्लव्स, बिना मास्क और बिना प्रोटेक्टिव ड्रेस के काम कर रहा हो, स्टाफ तो दूर डॉक्टर भी वही बिना सेफ्टी मेजर्स का पालन किये इलाज कर रहे हो तो फिर इन्फेक्शन और NICU में रखे नवजात शिशु की बेहतरी की कामना सिर्फ भगवान भरोसे ही की जा सकती है। NICU जैसे संवेदनशील यूनिट में भी डॉक्टर बच्चे का इलाज करते समय NICU सेफ्टी के बेसिक प्रोटोकॉल का भी पालन नहीं कर रहे।

इंटरनेट पर मौजूद एक तस्वीर को प्रथम दृष्टया देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि शायद डॉक्टर साहब को पता ही नहीं कि NICU इकाइयों में हाइजीन प्रोटोकॉल बिना मास्क, ग्लव्स, प्रोपर प्रोटेक्टिव ड्रेस एवं आवश्यक सुरक्षा मानकों के नवजात शिशुओं को संभालना Indian Public Health Standards (IPHS), NABH Guidelines तथा मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ द्वारा जारी नियोनेटल केयर गाइडलाइन का वायलेशन है साथ ही साथ medical negligence और Neonatal Safety Risk है।

फोटो: डॉ बी. किशोर (नारायणा चाइल्ड हॉस्पिटल) सोर्स : https://share.google/5PqU6RYKpWEnbpf7p

यह फोटो भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़ा कर रहा है जहां खुद डॉक्टर ही NICU प्रोटोकॉल तथा मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ की Facility Based Newborn Care Guidelines और NABH standards की धज्जियां उड़ाते दिख रहे हैं।

नवजात शिशु के स्वास्थ्य और मां बाप के इमोशंस के साथ खुलेआम खिलवाड़

यदि NICU जैसी संवेदनशील इकाइयों में hygiene, infection control और neonatal safety standards की अनदेखी हो रही है, तो यह केवल मॉनिटरिंग ऑथोरिटी की लापरवाही नहीं बल्कि जीवन के अधिकार से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है।

एक और वीडियो इसी नारायणा चाइल्ड हॉस्पिटल का सामने आया है, जो दिल दहलाने वाला है, जिसमें तथाकथित NICU यूनिट में कार्यरत अप्रशिक्षित महिला द्वारा नवजात शिशु को एक हाथ से केयरलेस तरीके से उठाया जा रहा है, मानो कोई स्टंट हो। देखें वीडियो:

यह वीडियो नारायणा चाइल्ड हॉस्पिटल का है जिसमें एक अप्रशिक्षित महिला तथाकथित नर्स NICU जैसी संवेदनशील इकाइयों में बिना मास्क, ग्लव्स, प्रोपर प्रोटेक्टिव ड्रेस के hygiene, infection control और neonatal safety standards की अनदेखी तो कर ही रही है बेहद लापरवाही से एक हाथ से नवजात शिशु को उठा रही है जैसे वह कोई स्टंट कर रही हो। यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि neonatal safety के साथ खुला खिलवाड़ है।

NICU (Neonatal Intensive Care Unit) और basic neonatal safety protocol

इस वीडियो में मात्र दो दिन के नवजात शिशु को जिस तरह संभाला जा रहा था, उसने कई लोगों को झकझोर दिया।

सवाल यह है कि क्या :

  • स्वास्थ्य विभाग ने कभी इन NICU यूनिट्स का वास्तविक निरीक्षण किया?
  • क्या सिविल सर्जन ऑफिस या जिला प्रशासन ने तथाकथित चल रहे NICU यूनिट्स का कभी कभी hygiene audit कराया?
  • क्या किसी ने स्टाफ क्वॉलिफिकेशन वेरिफाई किया?
  • या इंस्पेक्केशन रसूख और पैसों के बल पर सिर्फ और सिर्फ कागजों में होता रहा?

माननीय सर्वोच्च न्यायालय बहुत पहले स्पष्ट कर चुका है कि स्वास्थ्य सुविधा कोई दया नहीं, बल्कि Article 21 के तहत नागरिक का अधिकार है।
Paschim Banga Khet Mazdoor Samity v. State of West Bengal [(1996) 4 SCC 37]

इलाज के नाम पर सिर्फ commercial exploitation

लेकिन औरंगाबाद जिले में इस तरह की वीडियो और फोटोज देखने के बाद सभी के जेहन में प्रश्न यह है कि क्या जिले इलाज के नाम पर सिर्फ commercial exploitation चल रहा है? NICU के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है, लेकिन क्या उन यूनिट्स में वह बेसिक हाइजीन और neonatal protocol मौजूद है जो किसी newborn intensive care unit के लिए अनिवार्य माने जाते हैं? अगर नहीं तो जिला प्रशासन की चुप्पी क्यों है? क्यों हाइजीन ऑडिट, रेगुलर इंस्पेक्शन कागजों तक सीमित है?

Medical Negligence पर सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

Jacob Mathew vs. State of Punjab में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है:

  • अस्पताल और डॉक्टर को accepted medical standards follow करने होंगे।
  • गंभीर लापरवाही criminal negligence बन सकती है
  • Infection control, trained staff, neonatal handling आदि professional standards का हिस्सा हैं।

सबसे महत्वपूर्ण और भयावह — biomedical waste आखिर जा कहाँ रहा है?

जिले में कई जगह बायोमेडिकल वेस्ट डिस्पोजल की कोई स्पष्ट व्यवस्था दिखाई नहीं देती। यदि यह सच है, तो यह सिर्फ नियम उल्लंघन नहीं बल्कि पूरे शहर की पब्लिक हेल्थ के साथ खेल है।

बायोमेडिकल वेस्ट डिस्पोजल रूल्स, 2016 जो Central Pollution Control Board के अंतर्गत रेगुलेट होते हैं के मुताबिक हर hospital, clinic और NICU को अनिवार्य रूप से:

  • color-coded biomedical waste segregation,
  • Authorized disposal mechanism,
  • infection control system का होना अनिवार्य है लेकिन औरंगाबाद जिले में संचालित कई हॉस्पिटल और क्लिनिकों में बायोमेडिकल वेस्ट डिस्पोजल की व्यवस्था इन नियमों और दिशानिर्देशों को धता बता रही है।

सवाल यह उठता है कि

  • क्या इस्तेमाल की गई syringes, contaminated gloves, neonatal waste और infectious material का proper disposal हो रहा है?
  • क्या Pollution Control Board ने कभी ground inspection किया?
  • और सबसे महत्वपूर्ण क्या औरंगाबाद में संचालित किसी हॉस्पिटल, क्लीनिक के खिलाफ किसी ऑथोरिटी के द्वारा कोई बायोमेडिकल वेस्ट डिस्पोजल को लेकर कोई एक्शन लिया गया क्या? यदि नहीं, तो आखिर क्यों?

क्लीनिक परिसर के अंदर बिना सार्वजनिक दृश्य ड्रग लाइसेंस नंबर और जीएसटी नंबर लिखे ही चल रहे मेडिकल स्टोर पर संबंधित विभागों की चुप्पी

औरंगाबाद जिले में कई ऐसे मेडिकल स्टोर जो क्लीनिक और हॉस्पिटल परिसर के भीतर चल रहे हैं जिसमें सार्वजनिक तौर पर दृष्टव्य न तो ड्रग लाइसेंस नंबर है और न ही जीएसटी नंबर, यहां तक कि कम्प्यूटराइज्ड बिलिंग की जगह मैनुअली बिल बना रहे हैं, जिसको लेकर ड्रग डिपार्टमेंट पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

हालिया मगध एक्सप्रेस की टीम के संज्ञान में यह प्रकरण आया, जिसके बाद मगध एक्सप्रेस की टीम ने न्यू एरिया स्थित नारायणा चाइल्ड हॉस्पिटल परिसर के अंदर संचालित मेडिकल स्टोर, कर्मा रोड स्थित डॉ ओमप्रकाश के परिसर के बाहर चल रहे मेडिकल स्टोर समेत कई क्लीनिक परिसर में संचालित मेडिकल स्टोर का दौरा किया और पाया कि किसी भी मेडिकल स्टोर पर सार्वजनिक तौर पर दृष्टव्य न तो ड्रग लाइसेंस नंबर मिला और न ही जीएसटी नंबर, कई स्टोर द्वारा कम्प्यूटराइज्ड बिलिंग की जा रही थी पर कुछ मैनुअल बिल बना रहे।

यह वाकई गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है कि :

  • क्या स्थानीय Drug Inspector ने कभी जांच की?
  • क्या स्थानीय जीएसटी डिपार्टमेंट ने कभी इसकी जांच की?
  • यदि जांच हुई तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  • यदि जांच नहीं हुई तो यह regulatory failure नहीं तो और क्या है?

अस्पतालों की मनमानी या रेगुलेटरी इकोसिस्टम का फेल्योर

यह मामला केवल कुछ अस्पतालों का नहीं रह गया। यह पूरे regulatory ecosystem की क्रेडिबिलिटी का प्रश्न बन चुका है। क्योंकि यदि:

  • बिना parking
  • बिना transparent biomedical waste system
  • बिना visible compliance
  • बिना hygiene audit

और residential areas के भीतर बड़े मेडिकल एस्टेब्लिशमेंट वर्षों से चल रहे हैं, तो इसका अर्थ केवल इतना नहीं कि नियम टूट रहे हैं। इसका अर्थ यह भी है कि नियम लागू कराने वाले संस्थान या तो निष्क्रिय हैं, या फिर प्रभाव, रसूख और पहुंच के सामने मौन हैं।

माननीय उच्च न्यायालय, पटना हाल के ऐसे ही मामलों में प्रशासनिक “inaction” पर कड़ी टिप्पणी कर चुका है। माननीय न्यायालय ने कहा था कि अधिकारी ‘air-conditioned offices’ में बैठकर जनता की समस्याओं से मुंह नहीं मोड़ सकते। यह टिप्पणी आज औरंगाबाद की स्थिति पर भी उतनी ही सटीक बैठती है।

क्योंकि यहां सवाल केवल कानून का नहीं है। सवाल भरोसे का है। सवाल उन नवजात शिशुओं का है जिनकी जिंदगी supposedly intensive care के भरोसे छोड़ी जाती है। सवाल उन आम नागरिकों का है जो अस्पतालों के बाहर जाम में फंसते हैं। सवाल उस समाज का है जिसे यह भरोसा होना चाहिए कि स्वास्थ्य संस्थान कम से कम न्यूनतम सुरक्षा और कानून का पालन तो कर रहे होंगे।

लेकिन यदि Aurangabad में स्वास्थ्य सेवाएं भी नियमों से नहीं बल्कि “setting”, “influence” और प्रशासनिक चुप्पी से संचालित हो रही हैं, तो यह केवल एक जिले की समस्या नहीं — यह पूरे शासन तंत्र के लिए चेतावनी है।

आखिरकार अब सबसे बड़ा सवाल यही है:

क्या औरंगाबाद जिले में कानून कमजोर पड़ चुका है…या फिर कुछ लोगों को कानून से ऊपर मान लिया गया है?

Author

  • Kumar Ashwani

    Founder/CEO of Magadh Express, dedicated to amplifying public concerns and advancing transparent journalism with over a decade of experience in digital media, contributed to prominent platforms such as Dailyhunt and NewsDog. A certified Cyber Security Expert and Law Scholar, brings a rare combination of technical, legal, and journalistic insight to regional media. which reflects a strong commitment to credible, ethical, and impactful public interest reporting.

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