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ऐतिहासिक उमगा सूर्य मंदिर का अस्तित्व खतरे में,दीवारों में पड़ने लगी है दरारें, संरक्षण के अभाव में विलुप्त होता इतिहास

संजीव कुमार की स्पेशल रिपोर्ट :-

मगध एक्सप्रेस [12 मार्च 19 ];-बिहार में पर्यटन की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण उमगा तीर्थ स्थली औरंगाबाद जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर पूरब राष्ट्रीय राज मार्ग दो पर मदनपुुर मेंस्थित है. मुख्य पथ से एक किलोमीटर दक्षिण पर्वतों का श्रृंखला पर विशालकाय सूर्य मंदिर के साथ-साथ यहां अनेकों देवी-देवताओं की प्रतिमाएं है. मां उमगेश्वरी का स्थान पर्वत की श्रृंखलाओं पर है. इस स्थल को पौराणिक के साथ-साथ ऐतिहासिक स्थल भी माना जाता है. उमगा धाम के नाम से यह तीर्थस्थली विख्यात है. यूं तो नाम से ही स्पष्ट होता है कि उमगा, उमंग का ही विकृत रूप है. जब उमगा राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था तो उस समय वीर-बांकुड़े राजे-रजवाड़े सावन में आखेट खेलने के लिए पूरे भारतवर्ष से इस पर्वत पर आया करते थे. आखेट कौशल का आनंद ऐसा कहीं नहीं मिलता था, इसीलिए इसका नाम उमगा रखा गया था.

उमगा पर्वत श्रृंखला पर 52 मंदिर

उमगा के इतिहास के संबंध में प्राचीन ग्रंथों व शोधों से जो बातें अब तक सामने आयी है वह यह है कि यह क्षेत्र कोल भील आदिवासी राजा दुर्दम का क्षेत्र था. शुरू से अईल व ईल नामक दो राजा आखेट खेलने यहां आये थे. अपने पराक्रम व बहादुरी से एक शेर को पटक कर मारा था. इस घटना से प्रभावित होकर आदिवासी राजा दुर्दम ने अपनी इकलौती पुत्री की शादी राजा अईल से कर दी थी. राजा अईल घर जमाई बन कर वही रह गये. दूसरे भाई अपना देश वापस चले गये. राजा अईल के ही वंशज के 13वीं पीढ़ी में राजा भैरवेंद्र थे, जिन्होंने उमगा पर्वत श्रृंखला पर 52 मंदिरों की स्थापना की थी. उनके राज्य को देवमुंगा राज्य के नाम से जाना जाता था. राजा भैरवेंद्र देव गढ़ को एक मुसलिम शासक से जीत कर अपने शासन में मिला लिया था और विजयी दिवस के अवसर पर उमगा सूर्य मंदिर की तरह ही देव में भी किला से दक्षिण एक विशाल सूर्य मंदिर की स्थापना की थी. कलांतर में देवमुंगा राज्य देव व उमगा में विभक्त हो गया. राजा देव में ही रह कर उमगा पर शासन करते रहे.

948 एकड़ में फैला है उमगा पर्वत

उमगा पर्वत 948 एकड़ में फैली है. इसके उत्तर में भस्मासुर, दक्षिण में सतबहिनी व मटुक भैरव, पूरब में अनेकों देवी-देवताओ का स्थान व पश्चिम में विशाल सूर्य मंदिर है. सूर्य मंदिर से ठीक दक्षिण-पश्चिम कोने पर किला का खंडहर आज भी अपने गौरव गाथा को अपने अतीत में समेटे है. किला से पश्चिम 52 बीघा का विशाल तालाब है. दो हजार फुट की ऊंचाई पर है सूर्य मंदिर: उमगा पर्वत पर दो हजार फुट दूरी की चढ़ाई पर विशाल सूर्य मंदिर है. इसका दरवाजा पूरब की ओर है. मंदिर के भीतर गर्भ गृह में विशाल शिलालेख है,जिसमें मंदिर निर्माण से संबंधित बातें लिखी हुई है. मंदिर के अंदर में कई मूर्तियों को मुगलकालीन शासन में गायब कर दिया गया था. बाद में इसमें वहां के पुजारियों ने चतुभुर्जी गणेश, सूर्य, शिव आदि की मूर्ति इसमें स्थापित की थी. गर्भ गृह में ही पश्चिम दीवार से सटे सिंहासन पर जनार्दन, बलराम व सुभद्रा की मूर्तियां स्थापित है. सूर्य मंदिर से एक हजार फुट ऊपर सीढ़ीनुमा रास्ते से जाने पर सहस्त्रसिघी महादेव का एक मंदिर है. जहां एक विशाल शिवलिंग में हजारों लिंग की रचना की गयी है. बताया जाता है कि विश्व में यह अदभूत व अद्वितीय है.

सहस्त्रसिंघी महादेव से 50 फुट की दूरी पर एक कुंड बना है,जिसमें वर्षा का पानी जमा होता है और वहीं पानी पूजा के काम में आता है. कुंड के बगल में ही कष्टहरणी देवी व शंकर की मूर्ति स्थापित है. वहां से 400 फुट पूरब जाने पर एक बड़े चटान के नीचे मां भगवती उमगेश्वरी की पवित्र प्रतिमा स्थल है. यहां अष्टदल कमल पर मां भगवती जगदंबा विराजमान है. उमगा मेले में आनेवाले श्रद्धालु मां उमगेश्वरी का दर्शन अवश्य करते हैं. इस स्थल से 50 फुट दक्षिण एक खंडहरनुमा मंदिर है.

 

बताया जाता है कि मुगलकालीन शासन में इस मंदिर के तोड़ दिया गया था और स्थापित मूर्ति को चोरों ने चोरी कर ली थी. यहां से 200 फुट पूरब एक मंदिर में विशाल शिवलिंग स्थापित है. उसके आगे एक खंडहरनुमा दीवार पर शिव पार्वती आलिंगन पास में बंधे हुए मूर्ति दिखाई देते हैं. उसके आगे एक हजार फुट की दूरी पर गौरी शंकर की गुफा है. इस गुफा में गौरी व शंकर कामरत है. इस पर्वत श्रृंखला के सबसे ऊंची चोटी पर भग्नावेश एक मंदिर है, जिसकी पवित्र गुफा में नंदी के साथ शिव जी व विशाल दस भुजी गणेश की मूर्ति स्थापित थी. गणेश जी की मूर्ति को चोरों ने चोरी कर ली थी.

जिले में कुछ ऐसे भी धरोहर है जो प्राचीन और खूबसूरत होते हुए भी उपेक्षा का शिकार है और कम ही लोग उनके बारे में जानते है.ऐसे ही धरोहरों में से एक है औरंगाबाद के मदनपुर जिला मुख्यालय से लगभग 27 किलोमीटर की दुरी पर स्थित उमगा पहाड़ी की मंदिर श्रंखला. यह पहाड़ी ग्रैण्‍ड ट्रंक रोड से 1.5 कि.मी. दक्षिण की ओर एवं देव से 12 कि.मी. की दूरी पर स्थित है. जमीन से करीब डेढ़ सौ फीट ऊँचे पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर का दर्शन करने काफी पर्यटक आते हैं.अत्यंत प्राचीनउमगा पहाड़ी के मंदिर बिहार की सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में से एक है. 19वीं एवं 20वीं शताब्‍दी के प्रायः सभी नामचिन पुरातत्ववेताओं ने यहॉ के मंदिर श्रृंखलाओ का सर्वेक्षण किया तथा उसे अपने सर्वेक्षण प्रतिवेदन में महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिया है. मेजर किट्टो ने सन् 1847 में,श्री कनिंघम ने 1876 में , जे0डी0 बेगलर ने1872 में और ब्‍लॉच ने 1902 ई0 में इसका पुरातात्‍विक सर्वेक्षण किया तथा इसे अपने सर्वेक्षण प्रतिवेदनों में महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिया.
इन मंदिरो का निर्माण 1496 ई. पूर्व में कराया गया है. मंदिर के शिलालेख से पता चलता है कि पहले यह जगन्नाथ मंदिर था. 1496 ई. में सूर्य वंशीय राजा भैरवेंद्र ने मंदिर के गर्भगृह में बलराम और सुभद्रा की प्रतिमा स्थापित की थी . बाद में यह प्रतिमा समाप्त हो गई. प्रतिमा के समाप्त होने के बाद भगवान सूर्य की प्रतिमा स्थापित हुई तब से यह मंदिर सूर्य मंदिर के नाम से विख्यात हुआ. इस मंदिर की वास्‍तुकला अपने आप में एक दम अलग है, क्‍योंकि यह देव में स्थित सूर्य मंदिर के समान दिखता है.

प्राचीन मंदिरो की श्रंखला

मंदिर कमिटी के अध्यक्ष बालमुकुंद पाठक के अनुसार उमगा पहाड़ पर 52 देवी देवताओं के मंदिर थे जो संरक्षण के अभाव में नष्ट हो गए. आज उनके केवल अवशेष दिखते है. मुख्‍य मंदिर के अतिरिक्‍त उमगा पहाड पर कई मंदिर है जिनमें प्रमुख सहस्‍त्र शिवलिंग एवं ध्‍वंस शिवमंदिर है. पहाडी पर कई मंदिर एवं मंदिरों के अवशेष मिलाकर मंदिर ऋखला है इसकी पश्चिमी ढलान पर पूर्वाभिमुख वृहद मंदिर है जो देव मंदिर के ही समरूप है. गर्भगृह के अतिरिक्‍त यहॉ मण्‍डप है जो सुडौल एकाश्‍मक स्‍तम्‍भों के सहारे है मंदिर में प्रवेश करने के बाद द्वार के बांयी तरफ एक शिवलिंग एवं भगवान गणेश की मूर्ति है गर्भगृह में भगवान सूर्य की मूर्ति है मंदिर के दाहिने तरफ एक वृहद शिलालेख है सभी मूर्तियां एवं शिलालेख काले पत्‍थर से बने है जो पालका‍लीन मूर्ति कला के उत्कृष्‍ट नमूने है.

मेलो और महोत्सव का आयोजन

प्रत्येक वर्ष इस मंदिर को देखने एवं भगवान सूर्य का दर्शन करने तीन से चार लाख श्रद्धालु आते हैं. माघ बसंतपंचमी के दिन यहां विशाल मेला लगता है.पहली जनवरी को पिकनिक मनाने का यह रमनिक जगह है. मंदिर की महिमा एवं गरिमा को प्रचारित करने के लिए प्रत्येक वर्ष उमगा महोत्सव मनाया जाता है.इस बार भी जिला प्रशासन की ओर से 5 एव 6 मार्च को उमगा महोत्सव मनाया  है.

सरंक्षण के अभाव में खतरें में अस्तित्व

मंदिर पर्यटक एवं श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है. देखरेख के अभाव में मंदिर पर घास उग आया है. पत्थरों को तरासकर बनाये गये मंदिर में दरार उभर आये है. मंदिर के दक्षिणी एवं उतरी भाग में दरार साफ दिखता है. दिन प्रतिदिन पत्थरों के बीच के दरार बढ़ते जा रहे है. यहां लगभग 52 मंदिर हुआ करते जो सरंक्षण के अभाव में नष्ट प्रायः है और उनके केवल अवशेष बचे है.यहां मुख्यमंत्री नितीश कुमार काभी आगमन हो चुका है उस समय इसके विकास की उम्मीद जगी थी. मुख्यमंत्री यहां के प्राकृतिक सौंदर्य और स्थापत्य कला से बहुत प्रभावित हुए थे और यहां के पर्यटन के विकास की संभावना को स्वीकार करते उन्होंने इसके विकास का आश्वासन भी दिया था लेकिन वह विकास अभी तक उमगा नहीं पहुंचा है।

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