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शिवरात्रि स्पेशल ,शिव को क्यों प्रिय है गांजा और भांग 

 

मगध एक्सप्रेस [ 4 मार्च 18 ];-भगवान शिव और होली के साथ भांग का नाम बहुत पहले से जुड़ा चला आ रहा है, भारतीय संस्कृति और साहित्य में भांग, गांजे और चरस का इतिहास कम से कम 3000 साल पुराना है। जानकारों के अनुसार गांजा, चरस और भांग तीनों एक ही पौधे के अलग-अलग हिस्सों से बनते हैं। इस पौधे का साइंटिफिक नाम ‘कैनेबिस’ है, इसी पौधे को मारिजुआना, हेम्प और वीड के नाम से भी जाना जाता है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ आयुर्वेद एंड फार्माक्यूटिकल केमिस्ट्री में प्रकाशित एक पत्र के अनुसार, चिकित्सा में गांजे के शुरुआती प्रयोग की जानकारी 1500 ईसवीं पूर्व अथर्ववेद में मिलती है। इस प्राचीन ग्रंथ में भांग का उल्लेख है जो गांजे का ही एक रूप है। इसे पांच प्रमुख पौधों में से एक माना जाता है। होली के पर्व पर भी आज भी भांग के खाने की परंपरा है। प्राचीन चिकित्सीय ग्रंथ सुश्रुत संहिता में गांजे के चिकित्सीय प्रयोग की जानकारी मिलती है। सुस्ती, नजला और डायरिया में इसके इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है।

 

शिव को क्यों प्रिय है गांजा और भांग 

भगवान शिव के बारे में एक बात प्रसिद्ध है कि वे भांग और धतूरे जैसी नशीली चीजों का सेवन करते हैं। शराब को छोड़कर उन्हें शेष सारी ऐसी वस्तुएं प्रिय हैं। क्या वाकई शिव हमेशा भांग या अन्य किसी नशे में रहते हैं? क्यों उन्हें इस तरह की वस्तुएं प्रिय हैं? क्यों सन्यासियों में गांजा-चिलम आदि का इतना प्रचलन है?दरअसल भगवान शिव सन्यासी हैं और उनकी जीवन शैली बहुत अलग है। वे पहाड़ों पर रह कर समाधि लगाते हैं और वहीं पर ही निवास करते हैं। जैसे अभी भी कई सन्यासी पहाड़ों पर ही रहते हैं। पहाड़ों में होने वाली बर्फबारी से वहां का वातावरण अधिकांश समय बहुत ठंडा होता है। गांजा, धतूरा, भांग जैसी चीजें नशे के साथ ही शरीर को गरमी भी प्रदान करती हैं। जो वहां सन्यासियों को जीवन गुजारने में मददगार होती है। अगर थोड़ी मात्रा में ली जाए तो यह औषधि का काम भी करती है, इससे अनिद्रा, भूख आदि कम लगना जैसी समस्याएं भी मिटाई जा सकती हैं लेकिन अधिक मात्रा में लेने या नियमित सेवन करने पर यह शरीर को, खासतौर पर आंतों को काफी प्रभावित करती हैं।इसकी गर्म तासीर और औषधिय गुणों के कारण ही इसे शिव से जोड़ा गया है। भांग-धतूरे और गांजा जैसी चीजों को शिव से जोडऩे का एक और दार्शनिक कारण भी है। ये चीजें त्याज्य श्रेणी में आती हैं, शिव का यह संदेश है कि मैं उनके साथ भी हूं जो सभ्य समाजों द्वारा त्याग दिए जाते हैं। जो मुझे समर्पित हो जाता है, मैं उसका हो जाता हूं।

कई देशो को है गांजा की कानूनी मान्यता 

विश्व के 18 से ज्यादा देश चिकित्सीय प्रयोग के लिए गांजे को कानूनी वैद्यता प्रदान कर चुके हैं। भारत भी इस सूची में शामिल हो सकता है।  इवेल्युएशन एंड एथनोबोटेनी पुस्तक में लेखक ने पाया है कि गांजे के इस्तेमाल की जड़ में प्राचीन साहित्य और हिंदू धर्मग्रंथ हैं। इसमें कहा गया है कि पूरी 19वीं शताब्दी में मध्य भारत में खंडवा व ग्वालियर और पूर्व में पश्चिम बंगाल भारतीय उपमहाद्वीप में गांजे के सबसे बड़े उत्पादक और निर्यातक रहे हैं।डबलिन स्थित खाद्य पदार्थ नियामक प्राधिकरण का कैनाबिस फॉर मेडिकल यूज-ए साइंटिफिक रिव्यू इन 2017 एक व्यापक स्तर पर किया गया सर्वेक्षण है। यह 48 देशों में किया गया और इसमें गांजे के इस्तेमाल के आधार पर उनका वर्गीकरण है। इसमें पाया गया है कि कुछ देशों में सख्त नियम हैं और इसके इस्तेमाल का नियंत्रित किया गया है। डेनमार्क, एस्टोनिया, जर्मनी, नॉर्वे और पोलैंड उन देशों में शामिल हैं जो चिकित्सा में  गांजे के इस्तेमाल के लिए कानूनी ढांचा बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। चेक रिपब्लिक, इटली, ऑस्ट्रेलिया, इजराइल, नीदरलैंड, कनाडा और अमेरिका के कुछ राज्यों ने गांजे के चिकित्सीय कार्यक्रमों को पहले ही स्थापित कर दिया है।  

पिछले कई सालों में कई अध्ययनों में यह स्थापित करने की कोशिश की गई है कि गांजे में औषधीय गुण हैं। अध्ययन में बताया गया है कि गांजे में पाए जाने वाले कैनाबाइडियॉल (सीबीडी) से क्रोनिक पेन का सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है और इसके विशेष दुष्परिणाम भी नहीं हैं। इंडियन जर्नल ऑफ पैलिएटिव केयर के संपादक और मुंबई स्थित टाटा मेमोरियल सेंटर में असोसिएट प्रोफेसर नवीन सेलिंस का कहना है कि सीबीडी सकारात्मक नतीजे देता है।

हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने गांजे के इस्तेमाल से कई बीमारियों को जोड़ा है, मसलन दिमागी क्षमता को क्षति, ब्रोनकाइटिस, फेफड़ों में जलन आदि। डब्ल्यूएचओ यह भी कहता है कि कुछ अध्ययन बताते हैं कि कैंसर, एड्स, अस्थमा और ग्लूकोमा जैसी बीमारियों के इलाज के लिए गांजा मददगार है। लेकिन उसका यह भी मानना है कि गांजे के चिकित्सीय इस्तेमाल को स्थापित करने के लिए और अध्ययन की जरूरत है।

 

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