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कल है भगवान् सूर्य का जन्मदिन ,जानिये भगवान् सूर्य के जन्म से जुड़ी इतिहास के बारे में

धीरज पाण्डेय /रविकांत

मगध एक्सप्रेस [ 11 जनवरी 19 ];- सूर्य और चंद्र इस पृथ्वी के सबसे साक्षात देवता हैं जो हमें प्रत्यक्ष उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है। वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। वेदों की ऋचाओं में अनेक स्थानों पर  सूर्य देव की स्तुति की गई है। पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति,प्रभाव,स्तुति, मन्त्र इत्यादि विस्तार से मिलते हैं। ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है। 

 

दैत्य अक्सर देवताओं पर आक्रमण करते थे। एक बार भयानक युद्ध हुआ और वर्षों तक चला। उस युद्ध में सृष्टि का अस्तित्व संकट में पड़ गया। पराजित होकर देवगण वन-वन भटकने लगे। उनकी व्यथा लेकर देवर्षि नारद कश्यप मुनि के आश्रम में पहुंचे और संकट के बारे में बताया।नारद ने सलाह दी कि इस संकट से सूर्य के समान तेजस्वी और बलशाली सत्ता ही मुक्ति दिला सकती है। वह यदि देवों का प्रतिनिधित्व करे, तो बात बने। लेकिन सूर्य प्रकट रूप में एक महाविराट अग्निपिंड है, उसे मनुष्य के रूप में जन्म लेकर देवशक्तियों का सेनापतित्व करना चाहिए।ऐसी तेजस्वी संतान कोई तेजस्वी स्त्री ही जन्म दे सकती है। बहुत सोच-विचार और खोज-पड़ताल के बाद उन्होंने कहा क‌ि इसके लिए महर्षि कश्यप की पत्नी और देवमाता अदिति ही सूर्य की मां बन सकती हैं।देवमाता अदिति से अनुरोध किया गया। वह राजी हो गईं। तप, त्याग और ध्यान से अदिति ने भगवान सूर्यदेव को मनाया और उन्हें पुत्र रूप में जन्म लेने के लिए मनाया।

तथास्तु कहकर सूर्य भगवान अंतर्धान हो गए।कुछ दिन बाद सूर्य अदिति के गर्भ में आ गए। समय आने पर अदिति ने देखा कि उसके शरीर से दिव्य तेज निकल रहा है। अदिति से जन्मा होने के कारण उस बालक का अथवा सूर्य का नाम ‘आदित्य’ भी रखा गया।आदित्य तेजस्वी और बलशाली रूप में ही बढ़े हुए। उन्हें देख इंद्र आदि देवता अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने आदित्य को अपना सेनापति नियुक्त कर दैत्यों पर आक्रमण कर दिया। आदित्य के तेज के समक्ष दैत्य अधिक देर तक नहीं टिक पाए और जल्दी ही उनके पांव उखड़ गए।वे अपने प्राण बचाकर पाताल लोक में छिप गए। सूर्य के प्रताप और तेज से स्वर्गलोक पर फिर देवताओं का अधिकार हो गया। सभी देवताओं ने आदित्य को जगत के पालक और ग्रहराज के रूप में स्वीकार किया। सृष्टि को दैत्यों के अत्याचारों से मुक्त कर भगवान आदित्य सूर्यदेव के रूप में ब्रह्मांड के मध्य में स्थित हो गए और वहीं से सृष्टि का कार्य-संचालन करने लगे।

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