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कड़कती ठंढ में पितरो की मोक्ष कामना के निमित नेपाल एवं भूटान से आये पिंडदानी कर रहे पिंडदान ,जम्होर स्टेशन हुआ गुलजार

मगध एक्सप्रेस [3 जनवरी 18 ];- आदिगंगा कही जाने वाली पुनपुन नदी को पितृ तर्पण की प्रथम वेदी माना जाता है। आश्विन मास की कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से आरंभ होकर अमावस्या तक चलने वाले पितृपक्ष के मौके पर अपने पूर्वजों की मोक्ष की कामना लिए लाखों लोग गया आते हैं। वहीँ  नेपाल एवं भूटान में रहने वाले नागरिक [ विदेशी पर्यटक ] ठंढ  पितरों के मोक्ष की कामना लिए गया आने वाले श्रद्धालु  सर्वप्रथम औरंगाबाद जिले के गया मुगलसराय रेलखंड के अनुग्रह नारायण स्टेशन पहुँचते है वहां विष्णुधाम जम्होर और पुनपुन के घाट पर पहुंचकर प्रथम पिंडदान देते है।

नेपाल एवं भूटान से पहुँच रहे पिण्डदानी

पुनपुन का घाट प्रथम पिंडदान स्थल है, जहां देश – विदेश के श्रद्धालु अपने पितरों के लिए पूजा एवं तर्पण करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पुनपुन नदी को पितृ तर्पण की प्रथम वेदी के रूप में स्वीकार किया गया है। ऐसा कहा जाता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने सबसे पहले पुनपुन नदी के तट पर ही अपने पूर्वजों का पिंडदान किया था। उसके बाद ही उन्होंने गया में फल्गु नदी के तट पर पिंडदान किया था। परंपरा के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान पितरों के मोक्ष दिलाने के लिए गया में पिंडदान से पहले पितृ-तर्पण की प्रथम वेदी के रूप में मशहूर पुनपुन नदी में प्रथम पिंडदान का विधान है।इसी क्रम में इन दिनों जम्होर स्थित पुनपुन घाट पर पिंडदान  लिए सैकड़ो की संख्या में नेपाल एवं भूटान से पिंडदानी यहाँ पहुँच रहे है और बढ़ती ठंढ में भी अपने पितरो की मोक्ष कामना के उद्देश्य से पिंडदान कर रहे है।

पुनपुन घाट पर मौजूद पिंडदानी श्रद्धालुओ के मुख्य पंडा रहे आचार्य कुंदन पाण्डेय ने बताया कि पुराणों में वर्णित आदि गंगा पुन: पुन: कहकर पुनपुन को आदि गंगा के रूप में महिमामंडित किया गया है और इसकी महत्ता सर्वविदित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस स्थल पर गयासुर राक्षस का चरण है। गयासुर राक्षस को वरदान प्राप्त था कि सर्वप्रथम उसके चरण की पूजा होगी। उसके बाद ही गया में पितरों को पिंडदान होगा। आदिगंगा पुनपुन में पिंडदान करने के बाद ही गया में किया गया पिंडदान पितरों को स्वीकार्य होता है। 

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